Friday, July 31, 2009

विचार-३

-ओम राघव
सब गुण से भरपूर धरा, गर कर देंगे देवाधि देव,
तब देव न मैं बनना चाहूं, आमरण की न रहे चाह देव।
मिलता मोक्ष धरा से ही, यह सत्य सनातन कहलाया,
ऋषियों ने यही तत्व खोजा, गाया भी और फिर पाया।
देख धरा की ऐसी गरिमा, स्वर्ग देव भी आएंगे,
मुक्ति का द्वार धरा खोले, यह तथ्य समझना चाहेंगे।

विस्तृत देखिये http://dadajikablog.blogspot.com/

पद्म पुराण में मिलते हैं मानव के किसी अन्य ग्रह से आने के संकेत

-सुधीर राघव
धरती पर मानव जीवन क्या किसी अन्य ग्रह से आया। इसके कुछ -हलके संकेत पुराणों में मिलते हैं। इस लिहाज से पद्म पुराण में सृष्टि के निर्माण की कथा भीष्म और पुलस्त्य के संवाद के हवाले से मिलती है। ब्रह्मा ने सृष्टि का निर्माण कैसे किया इसे लेकर काफी रोचक विवरण है। यह विवरण आप पढ़ सकते हैं-
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समलैंगिकों की शादी में चंपू का डांस

चंडीगढ़ पुलिस यानी अपनी चंपू की मानें तो समलैंगिकों की शादी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं बनती। शहर में करीब डेढ़ महीने पहले कुछ समलैंगिकों की शादी की खबर और तस्वीरें अखबारों में छपी थीं। बाद में पता चला कि शादी करने वाले कुछ समलैंगिक जोड़े पहले से भी शादी-शुदा और बाल-बच्चेदार हैं। इस पर एक सामाजिक संस्था ने इसे हिन्दू मैरिज एक्ट के खिलाफ मानते हुए पुलिस को शिकायत दी। सेक्टर-२८ के एडवोकेट सतिंदर सिंह ने एसएसपी को शिकायती अर्जी दी थी कि यह हिन्दू मैरिज एक्ट का भी उल्लंघ्न है। शादी करने वालों के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज करने की भी गुहार की गई थी। इस संबंध में एक बार २६ जुलाई को रुक्का देकर सतिंदर को शादी में बुलाया गया। मगर जांच पूरी ठंडे बस्ते में ही दिखती है। इस संबंध में जब संबंधित इंस्पेक्टर से पूछा गया तो उसका कहना था कि मेरे ध्यान में ऐसी किसी शिकायत की जांच मैं नहीं कर रहा। यह तब कहा गया, जबकि इस थाने से ही रुक्का भेज कर सतिंदर सिंह को बुलाया गया। दूसरी ओर डीएसपी जो एसडीपीओ भी हैं का कहना है कि हमारे पास शिकायत आई थी, कोई शिकायत नहीं बनती। शिकायत लौटा दी गई है। (यह खबर विस्तार से हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के शुक्रवार के अंक में देखी जा सकती है।)

जीवन ध्येय

-ओम राघव
करो कुछ ऐसा काज कि दुनिया जाने.
ऐसे छोड़ो निशान, जिसे दुनिया माने।
होकर पैदा जाने कितने ऐसे चले गए.
न पाया कोई जान, लोक उस चले गए।
ग्रह-पिंड ब्रह्माण्ड जीवों से भरा पड़ा है,
यह पृथ्वी-आकाश सारा अटा पड़ा है।
विस्तार से पढ़े -
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Thursday, July 30, 2009

प्रातःकाल

प्रमाण उस ब्रह्म का आस्तित्व का।
हमारा अहम आ जाता बीच में,
नहीं हम चाहते फिर सीखना उनसे
सोचते मानव ही है, उत्कृष्ठ नमूना ब्रह्म का
जो नहीं सीखता, बल्कि पालता है,
दम्भ अपने अल्पग्यान का।

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Wednesday, July 29, 2009

अन्य ग्रह से आए यान की क्रैश लैंडिंग की पहली कथा

-सुधीर राघव

समुद्र मंथन महज एक पौराणिक गल्प कथा नहीं है। समुद्र मंथन की कथा असल में अंतरक्षीय घटनाओं पर विमर्श की पहली दस्तावेजी घटना है। इसका वर्णन कुछ अतिश्योक्तिपूर्ण जरूर है। यह कथा स्कंद पुराण के माहेश्वर खंड में मिलती है। इसे पढ़ने पर जो संकेत मिलते हैं, उससे लगता है की किसी अन्य ग्रह से इंद्र आदि देवताओं के लिए रसद लेकर आया अंतरिक्षयान (मन्दराचल) पृथ्वी के वायुमंडल में खराब हो जाने के बाद अपने तय स्थान क्षीर सागर में नहीं उतर सका। इस यान का समुद्र में लाकर ही खोला जा सकता था। इसलिए इसे मिशन को नाम दिया गया समुद्र मंथन। उस समय दैत्य राज बलि ने इंद्र को पराजित कर समस्त संसाधनों पर कब्जा कर रखा था, ऐसे में बिना उनकी मदद से इस यान को वापस समुद्र में लाना संभव नहीं था। राक्षसों को मनाने के लिए इस मिशन के मूल तथ्यों को गुप्त रखा गया। (इस संबंध में विस्तार और वैग्यानिक नजरिए से स्कंद पुराण की कथा नए संदर्भ में इस ब्लॉग पर उपलब्ध है

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अब चिड़ियों को दाना डालेंगे चांद

फिजा से शादी रचाने के लिए मुसलमान बने हरियाणा के पूर्व उप मुख्यमंत्री चंद्रमोहन अब फिर इस्लामधर्म छोड़कर बिश्नोई समाज में शामिल हो गए हैं। इसके लिए हिसार में वह बिश्नोई मंदिर अपनी मां जसमां देवी के साथ पहुंचे। वहीं समाज के प्रमुख धाम मुकाम के पीठाधीश आचार्य रामानंद ने उन्हें समाज में फिर शामिल करने की प्रक्रिया विधवत पूरी की। सबसे पहले चांद मोहम्मद उर्फ चंद्रमोहन ने बिश्नोई समाज से माफी मांगी। रामानंद ने उन्हें दंड सुनाया कि वह सौ क्विंटल दाना मुकाम में आकर पक्षियों को डालेंगे। साथ ही उन्हें गोशाला में गायों के सेवा करने को भी कहा गया है। (यह खबर विस्तार से हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में पढ़ी जा सकती है)

Tuesday, July 28, 2009

समुद्र मंथन- दूसरे ग्रह से आए यान की क्रैश लैंडिंग की पहली कथा

-सुधीर राघव
समुद्र मंथन महज एक पौराणिक गल्प कथा नहीं है। समुद्र मंथन की कथा असल में अंतरक्षीय घटनाओं पर विमर्श की पहली दस्तावेजी घटना है। इसका वर्णन कुछ अतिश्योक्तिपूर्ण जरूर है। यह कथा स्कंद पुराण के माहेश्वर खंड में मिलती है। इसे पढ़ने पर जो संकेत मिलते हैं, उससे लगता है की किसी अन्य ग्रह से इंद्र आदि देवताओं के लिए रसद लेकर आया अंतरिक्षयान (मन्दराचल) पृथ्वी के वायुमंडल में खराब हो जाने के बाद अपने तय स्थान क्षीर सागर में नहीं उतर सका। इस यान का समुद्र में लाकर ही खोला जा सकता था। इसलिए इसे मिशन को नाम दिया गया समुद्र मंथन। उस समय दैत्य राज बलि ने इंद्र को पराजित कर समस्त संसाधनों पर कब्जा कर रखा था, ऐसे में बिना उनकी मदद से इस यान को वापस समुद्र में लाना संभव नहीं था। राक्षसों को मनाने के लिए इस मिशन के मूल तथ्यों को गुप्त रखा गया। (इस संबंध में विस्तार और वैग्यानिक नजरिए से स्कंद पुराण की कथा नए संदर्भ में इस ब्लॉग पर उपलब्ध है-
http://sudhirraghav.blogspot.com/

चंडीगढ़ की चार नई पहचान

अब चंडीगढ़ की चार नई पहंचान होंगी। अंडमान निकोबार द्वीप समूह और लक्ष्यदीप के बाद चंडीगढ़ ऐसा तीसरा केंद्र शासित प्रदेश बन गया है, जिसने अपने प्रतीक घोषित कर दिए हैं।
स्टेट ट्री - चंडीगढ़ का स्टेट ट्री आम होगा। इसकी वजह यह बताई जाती है कि यह इलाका पहले अपनी अमराई के लिए जाना जाता था। पहले यह अंबाला का हिस्सा था। इसी वजह से इस क्षेत्र का नाम आमवाला जो बिगड़ कर अम्बाला हुआ। यहां के कुछ सेक्टरों में अब भी आम के प्राचीन पेड़ देखे जा सकते हैं, जो अब हेरिटेज का हिस्सा बन चुके हैं।
स्टेट फ्लावर - पलाश यानी ढाक चंडीगढ़ का स्टेट फ्लावर होगा। वही ढाक जिनके फूलों से बसंती रंग बनता है। कृष्णजी इसी रंग से होली खेलते थे। ढाक का पुराना महत्व है। इस पेड़ पर तिकड़ी के रूप में पत्ते आते हैं। इसलिए ढाक के तीन पात मुहावरा भी बना है। इसके फूलों को ही टेसू के फूल कहा जाता है। ढाक के सुर्ख गुलाबी-लाल से ये फूल जब जंगल में खिलते हैं तो लगता है, जंगल में आग लगी है।
स्टेट बर्ड - चंडीगढ़ की स्टेट बर्ड होगी इंडियन ग्रे हॉर्नबिल। यह पक्षी सुखना वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में खूब देखा जा सकता है। इन्हें हमेशा जोड़ों के रूप में देखा जाता है। मादा पेड़ की खोतर में जब अंडे देती है तो नर इस बिल को ऊपर से ढक देता है। फिर खुद दाना लाकर बच्चों और मादा का पेट भरता है। इस पक्षी की संख्या लगातार घट रही इन्हें बचाने की मुहिम तेज करने की भी जरूरत है।
स्टेट एनिमल -नेवला चंडीगढ़ का स्टेट एनिमल होगा। नेवले के बारे में सब को मालूम है कि वह सांप को भी मार सकता है। मगर अब इन्हें भी संरक्षण की जरूरत है।
(हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के मंगलवार के अंक में चित्रों सहित यह खबर विस्तार से देखी जा सकता ही। अन्य अखबारों ने भी अपने पूल आउट पर इसे प्रमुखता से छापा है)

Monday, July 27, 2009

दादा जी से मिलिए

दादा जी के ब्लॉग पर उसके पाठकों के लिए कुछ और जानकारी डाली गई है। अगर आप भी मिलना चाहते हैं दादा जी से तो नीचे लिंक उपलब्ध है।

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गे के चक्कर में गड़बड़

कालेज और यूनिवर्सिटी में नए सेशन के लिए दाखिले शुरू हो चुके हैं। बाहर से आने वाले छात्र हॉस्टलों में ही रहते हैं। अब गे का शिगूफा इतने जोरदार तरीके से चल रहा है कि छात्र ही आपस में मजाक उड़ाते हैं। पहली साल वाले छात्रों को अलग कमरा नहीं मिलता उन्हें रूम शेयर करना होता है। छात्रों ने प्रशासन से शिकायत भी शुरू कर दी है कि अगर उनका रूम पार्टनर गे निकला तो उनका जीवन दूभर हो जाएगा। उन्हें अलग कमरा दिया जाए। इसी तरह की शिकायतों पर चर्चा शुरू हुई तो एक वार्डन ने सुझाया कि गेइज्म से बचने के लिए एक कमरे में दो नहीं तीन छात्र रखो। तीन के होने से अगर कोई ऐसा है तो हल्ला हो जाएगा और इस तरह की घटना को रोका जा सकेगा। (पढ़े चुगलियां-चुटकियां, हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के सोमवार के अंक में)

कहीं आपके घर में सांप तो नहीं

बरसात के मौसम में सर्पदंश की घटनाएं काफी होती हैं। चंडीगढ़ जैसे हरे-भरे शहर में यह संख्या दो-तीन महीने में ही सौ से ऊपर पहुंच जाती है। एक अनुमान के अनुसार शहर में हर साल करीब हजार सांप मार दिए जाते हैं। हालांकि इस बार बरसात कम होने की वजह से ऐसे मामले भी आश्चर्यजनक रूप से कम है। बिलों में पानी भर जाने से सांप बाहर निकल आते हैं। चंडीगढ़ में तीन तरह के जहरीले सांप पाये जाते हैं। ये हैं कोमन क्रेट, कोबरा और रसल वाइपर। कोमन क्रेट अक्सर चूहों का पीछा करते हुए आपके घर के अंदर पहुंच जाता है। इसे अंधेरी और सीलनभरी जगह पसंद है, इसलिए यह आपकी किचन या बाथरूम को छिपने का ठिकाना बनाता है, वह भी तब जब यहां अंधेरा होता है। यहां स्नेक सेल चलाने वाले कैप्टन सुरेश का कहना है कि अगर जरा सी सावधानी बरती जाए तो सांप और आप दोनों की जिंदगी बच सकती है। काटने वाला सांप जहरीला था या नहीं, यह दंश की जगह को देखकर आसानी से पता लगाया जा सकता है। अगर दंश की जगह पांचों दांत चांद की तरह नजर आ रही हों तो समझो सांप जहरीला नहीं है, अगर दंश की जगह सिर्फ दो गहरे जख्म नजर आ रहें हों यानी दो ही दांतों के जख्म तो समझो सांप जहरीला है। सर्पदंश के बाद आधेघंटे के भीतर अस्पताल पहुंचना जरूरी होता है। जहां दंश हो वहां ऐसा जख्म बनाएं कि कम से कम एक चम्मच खून बह जाए। यह खबर विस्तार से हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के सोमवार के अंक में भी पढ़ी जा सकती है।

Sunday, July 26, 2009

पोते का फोन

-ओम राघव
सुन पोते का फोन, मन दादी का भर गया
घर के सारे लोगों में अनन्द कर गया।
वाणी तोतली दादी में नवप्राण भर गई
माहोल सारे घर का शीतल यान कर गई।
याद पोते की दादी को खूब सताती है,
जब आता नहीं फोन, तब उसे रुलाती है।
(यह पूरी कविता व अन्य कविताएं आप पढ़ सकते हैं-
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कई बसे बंद - हरियाणा रोडवेज का नया खेल

हरियाणा राज्य परिवहन ने अधिकारियों को फरमान जारी किया है कि जिस रूट पर कमाई १६ रुपए प्रति किलोमीटर से कम होगी उस बस को बंद कर दिया जाएगा। इस तरह लोगों की सुविधा से जरूरी रोडवेज के लिए पैसा हो गया है। कोई आदमी देर-सवेर फसा है और पता चला कि उस गांव से होकर जाने वाली एकमात्र बस भी बंद कर दी गई है। वैसे इस फरमान के चलते पंचकूला से पंजाब की ओर जाने वाली दो बसें बंद की जा चुकी हैं। शनिवार को इसी फरमान के चलते दिल्ली जाने वाली दो बसें बंद कर दी गईं। इस पर यात्रियों ने बस अड्डे पर हंगामा काटा। इस तरह के आदेश को अटपटा माना जा रहा है। कुछ लोग यह कायस भी लगा रहे हैं कि पंजाब में बादल परिवार की तरह हरियाणा में भी ट्रांसपोर्ट किंग बनने का खेल तो नहीं खेला जा रहा। कुछ रूटस की बसें बंद कर वहां फिर निजी बसों को हरी झंडी दी जाए। सरकारी व्यवस्था में अधिकारों का दुरुपयोग कैसे होता है, यह उसका सबसे अच्छा उदाहरण है।

फिजा लौटकर घर को आई

सोनी इंटरटेनमेंट पर चल रहे शो मुझे इस जंगल से बचाओ की एक प्रतियोगी फिजा मलेशिया के जंगल छोड़कर आ गई हैं। यह वही फिजा हैं जो हरियाणा के पूर्व उप मुख्यमंत्री चंद्रमोहन से शादी के बाद चर्चा में आईं। मोहाली स्थित अपने घर पहुंचकर उन्होंने कहा कि थैंक गॉड में वापस आ गई हूं। शनिवार को ही उनका जन्मदिन था, मगर उन्हें सबसे बड़ा अफसोस यह है कि जन्मदिन को भी चांद ने उन्हें विश नहीं किया। टीवी के नाटक उन्हें नोटंकी लगते हैं। उनका कहना है कि अब वह नाटकों में काम नहीं करेंगी, बल्की राजनीति में हाथ आजमाएंगी। वैसे शाकाहारी होने की वजह से भी उन्हें मलेशिया के जंगल में खासा परेशानी हुई।

Saturday, July 25, 2009

सद्कर्म

-ओम राघव
क्या स्मृति बिगत की कुछ रहती नहीं
फिर कल्पना से मान लें
मिला है शरीर बुद्धि मन स्थान और आत्मा को जान लें-
प्रारब्ध नियति पूर्वकर्म कुछ भी कहो
बिना सोचे क्या जिन्दगी नहीं उम्र भर चलती रही?
और पुण्य व पाप के घट भरती रही -
कब क्यों इच्छित अनिच्छित भोग-भोगे?
दिल-दिमागी चित्र खींचा एक ने
समझने में बड़ा प्यारा लगा
पर व्यवहार में कुछ और देखा
पर दूसरा इन्सान जिसका चरित्र और व्यवहार
आदर्श अनुकरणीय देखा
क्या सोचना?
यह होगा न वह होगा
न सोचा कभी- होता रहा वैसे अधिक
कर्म तो होते रहेंगे दृष्टिकोण अपना या गैर का
गेऱना समझना फेर किसका
समझना क्या आसान?
दोष कहां-फिर और किसका?
अतःएव-
विगत में क्या किया?
मात्र सदकर्म करने में ही ध्यान हो
परिणाम-इदम शरीर स्थान मन बुद्धि कर्म सुख
जो पाया वर्तमान में
वर्तमान आधारशिला भविष्य की
सदकर्म से सदमार्ग
शांतिमिले जीव का निश्चय ही कल्याण हो।
सदकर्म की हो सोच और कर्म कर।
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सांप की तरह अपने ही अंडे खा रही हैं खाप पंचायतें

-सुधीर राघव
सभी जीव अपनी संतती की रक्षा करते हैं और वृद्धि करते हैं। अपनी ही संतानों की हत्या के षड्यंत्र रचने के किस्से बहुत कम मिलते हैं। सौतेली संतानों के लिए ऐसा करने के बहुत उदाहरण होंगे। हां संतानों द्वारा बड़ों की हत्या कर सत्ता कब्जा लेने के भी बहुत उदाहरण हैं। जीव हमेशा अपनी वंश वृद्धि करते हैं और शत्रुओं का हनन करते हैं। हरियाणा की खाप पंचायतें जिनका मूल आधार ही गोत्र और वंश हैं, वे सांप की तरह अपने ही अंडे खा रहे हैं। ऐसे में कहां वे गोत्रों के विकास और रक्षा की बात कर रहे हैं। वह कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाकर ऐसा कर रही हैं।
इस संबंध में ग्रामीणों और संबंधित समुदायों को जागरूक करने के लिए क्या अभियान नहीं चलाया जाना चाहिए। यह सवाल मैंने हरियाणा के दो प्रमुख लोगों से पूछा, पहले थे अखिल भारतीय जाट महासभा के अध्यक्ष पवनजीत सिंह। वह झज्जर और सिंहवाल की घटना पर पहले तो सफाई देते से नजर आए। उनका कहना था कि पंचायतें ऐसा नहीं करती हैं, बात जब परंपराओं के खिलाफ जाती है तो लोग आवेश में आकर कदम उठाते हैं। वेदपाल की हत्या भी आवेश में की गई। जब उनसे यह पूछा गया कि जब पंचायतों की नाराजगी के बाद अपने ही गोत्र के बच्चे मारे जा रहे हैं तो क्या इस संबंध में पूरे प्रदेश में किसी अभियान की जरूरत महसूस नहीं हो रही है। ऐसे कौनसे कारक हैं जो ऐसे परिस्थितयां खड़ी कर रहे हैं और उनके समाधान के रास्ते निकाले जाने चाहिए। उनका कहना था कि हां अभियान की जरूरत हैं। हम लोग बैठकर विचार करेंगे।
यही सवाल आर्यसमाज के स्वामि अग्निवेश जी से किया गया तो उनका कहना था कि समाज दो जन्मना जातिवाद के खिलाफ दो सदी से मुहिम चलाए हुए है। अग्निवेश जी सुधारक और विचारक की छवि रखते हैं तथा मंदिरों के बहाने हो रहे अवैध कब्जों के खिलाफ मुहिम पर जोर देकर एक और अच्छी पहल की है। ऐसे में खाप-पंचायतों द्वारा कानून व्यवस्था के लिए खड़ी की जा रही समस्या के प्रति मुहिम खड़ी कर पाना खुद खाप से जुड़े लोगों द्वारा ही संभव है। अगर बाहरी लोग इस दिशा में कुछ करेंगे तो जाहिर है विवाद बढ़ेंगे, लेकिन समुदाय के पढ़े-लिखे लोगों को खापों की मनमानी के खिलाफ आगे आना चाहिए। अपने ही बच्चों को मार कर आप कोई भला संदेश नहीं दे रहे हैं, युवा खून विद्रोही होता है, पंचायतों पर हुक्का गुड़गुड़ाते बुढ़ाते लोग अगर समझते हैं कि उनके कठोर फैसले प्रेम विवाहों को रोक सकते हैं तो वे गलती पर हैं, ऐसे मामले और बढ़ेगे। समझदारी इसी में है कि बच्चों को सही संस्कार दें। डंडे के जोर पर काम करोगे तो तालिबान कहलाओगे या फिर जंगली। क्योंकि जंगल में ही लाठी अकल से बड़ी होती है।

मिड डे मील में बिस्कुट -विग्यापनी तर्क

अब चंडीगढ़ के सरकारी स्कूलों में मिड डे मील में ग्लूकोज के बिस्कुट मिलेंगे। यह निर्णय एक सेंपल सर्वे के बाद लिया गया था। सर्वे में पाया गया कि मिड डे मील के रूप में अब तक जो भोजन दिया जा रहा था, उसकी पोष्टिकता जरूरत से आधी ही है। इसलिए यह फैसला किया गया कि उन्हें मिड डे मील में ग्लूकोज के बिस्कुट दिए जाएं। शायद मान लिया गया है कि बिस्कुट से पूरी पौष्टिकता मिल जाएगी? मानने के बहुत से कारण हो सकते हैं, जैसे कि फलाना टाइगर बिस्कुट खा कर बच्चे शेर बन गए जैसे विग्यापन भी। देखते हैं बच्चे रोज बिस्कुट खाकर कितने हृष्ट-पुष्ट होते हैं।

Friday, July 24, 2009

मृत्यु है आनंददायक

-ओम राघव
रहें तन से मन से स्वस्थ्य
वही जीना सुंदर है
रहें रोगी तन से मन से
वह जीना ही असुंदर है
स्वस्थ रहें जब तक दुनिया में
जीने का वास्तविक अर्थ है
थकें हाथ-पैर उंगलियां शरीर की
औरों के सहारे का जीवन ही व्यर्थ है।
जिएं जितने वर्ष दुनिया में
उसका क्या मूल्य है
समाज हित किए कर्म जिसने
वही जीवन अमूल है
रोगी तन-मन कर्ज समाज का
बनी केवल भार इस भूमि का
विश्व में पल रहे अनेक जीव
जीना उसका भी यथा एक कृमि का
गर मौत आ गई शोक-मलाल कैसा?
न कभी जीव और न मन मरे
मरण केवल मानव शरीर का
छोड़ना जब कभी यह तन पड़े
मृत्यु है आनंददायक
डूब आकंठ जीव स्नान करे जिसमें
जीवन के श्रम की होती थकान दूर
नए वस्त्र जीव पहन नव-द्वार चल पड़े
स्वागत है आए मौत उसका,
चल पड़ मेहमान की तर्ज पर
आया जो रहता कुछ देर-दिन
चला जाता लौट निज द्वार जिस तरह।।
साभार - dadajikablog.blogspot.com

बड़े शहरों की बस का समय अब अपने शहर से जानिये

अब चंडीगढ़ के लोग दिल्ली, चेन्नई, मुंबई या किसी भी शहर की बसों का समय घर बैठे ही जान सकेंगे। इससे लोगों को दूसरे शहरों में जाने से पहले ही अपनी योजना बनाने में मदद मिलेगी। इसके लिए केंद्र सरकार ने नेशनल पब्लिक ट्रांसपोर्ट हेल्पलाइन शुरू करने का फैसला किया है। फिलहाल केंद्र ने इसके लिए राज्य सरकारों से मदद मांगी है। इस बारे में संचार मंत्रालय एक नंबर भी अलाट करने जा रहा है। रेलवे के लिए यह पहले ही १५५२२० अलाट किया जा चुका है। (इस संबंध में खबर विस्तार से हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के शुक्रवार के अंक में पढ़ी जा सकती है।)

मोन या संवाद से

-ओ़म राघव

कैसे-किसको पुकारें?

कब-कहां संसार में रह कर

और कैसे संवारें?

मौन से या संवाद से

व्यवधान लगते संवाद से प्रसूत तर्क

मन-इंद्रियों की शक्ति अपनी-मौन ज्यादा

संवाद से संतुष्ट, कुछ असंतुष्ट होते

कैसे हो सके संवाद?

सर्वमान्य फिर

बिना संवाद शून्य है समाज

है तथ्य यह भी नहीं क्या?

साथ मन के संवाद-बने मौन
इन्द्रिय गोचर नहीं, पर वह भी तो संवाद है

यह संसार कल्पित, संवाद से ही होता प्रकट

सुख-दुख-हर्ष-अमर्ष लेकर

मानो वास्तविक लगता और गहरा संसार फिर

आज है भविष्य में ऐसे ही रहेगा?

मन से मौन-संवाद आत्मा से हो

जीव लाखों वर्ष से कर रहा है खोज जिसकी

क्या संभव है सार्थक पुकार?

फिर सोच कैसी?

सोचना ही व्यर्थ जैसे
समझना अनिष्ट या कष्ट का कारक दूसरा (संवाद)

सुख-हर्ष अपना साख दे निज अहंकार को

है जो कल्पित निरा

निज सोच का भाव उसके अनुरूप ही संवाद है?

अंदर से मिले शक्ति मौन से

बाह्य विचारों की बने शून्यता

तब ही लक्ष्य होगा सामने

ये दृश्य संसार कुछ और ही दृश्यमान होगा

पुकार-सत्य का कहना कठिन, सुनना कठिन

न शरीर अपना, न मन अपना, बने सहज स्थिति

आनंदानभूति प्रकट सबकुछ स्वयं हो

आना सफल जीना सफल समाज का

और सफल अंतिम सफर

संवाद से संसार है-समाज है

पर आत्मा की तो मौन ही आवाज है

संवाद करना ही पड़ेगा-दीखते संसार में

मौन होना ही पड़ेगा, सत्य को अगर खोजना है

मौन ही है अंतिम पड़ाव जीव का।

यहां हीर-रांझा के लिए कोई वारिस शाह नहीं रोता

सुधीर राघव चंडीगढ़
माना जाता है कि समाज अपने आघात से सीखता है, मगर हरियाणा में आकर ऐसी मान्यताएं अक्सर खापों के कठोर फैसलों के आगे टूटती दिखती हैं। गोत्र के दायरे से बाहर जाकर विवाह और प्रेम विवाह करने वालों के खिलाफ मौत तक के फरमान बदस्तूर जारी होते हैं। इसके बावजूद ऐसे विवाह हो रहे हैं और फरमान भी उसी गति से जारी हो रहे हैं। शादी ही नहीं, कई बार बच्चा होने के बाद भी दंपति को भाई-बहन बनने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। इस तरह के फरमान सुनने में पूरी तरह तुगलकी और तालिबानी लगते हैं। इसके बावजूद हरियाणा का कोई कद्दावर नेता या पुलिस अधिकारी इस खापतंत्र के खिलाफ जुबान खोलने को राजी नहीं। इस संबंध में खापों के अपने तर्क हैं। वह यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि इसकी वजह पंचायतों के अपने अधिकारों से आगे जाकर फैसला करना है। उनका मानना है कि नियमों में ही कुछ खोट है। अखिल भारतीय जाट महासभा के अधक्ष पवनजीत सिंह का कहना है कि हिन्दू विवाह अधिनियम हमारे समाज के अनुरूप नहीं है। कानूनी तौर पर ऐसी शादियों को मंजूरी दे दी जाती है, जिनमें लड़का-लड़की को हमारी संस्कृति के अनुसार भाई-बहन माना जाता है। ऐसे में टकराव तो होता रहेगा। लोग भले ही इन्हें तुगलकी और तालिबानी फरमान कहें, मगर हमारी जड़ों और जरूरतों को समझते हुए प्रावधान किया जाना चाहिए और हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन होना चाहिए। जब तक यह नहीं होगा, ऐसे टकराव होते रहेंगे। परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं, वे किसी एक के लिए नहीं टूट सकतीं। आर्य समाज के स्वामि अग्निवेश सिंहवाला की घटना को सरकार की नाकामी के रूप में देखते हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई नागरिक हाईकोर्ट से आदेश लेकर भी सुरक्षित नहीं है तो इसका मतलब है कि सरकार कमजोर है। वह कानून व्यवस्था को लागू करवापाने में नाकाम है। सरकार को सामंती ताकतों के आगे नहीं झुकना चाहिए। आर्य समाज हमेशा से ही जन्मना-जातिवाद व्यवस्था के खिलाफ रहा है। आर्य समाज के मंदिरों में देशभर में प्रतिदिन ७०० से ८०० शादियां होती हैं और इनका आधार जाति नहीं होता। साथी चुनने का अधिकार हर युवक-युवती को है। परिवारवालों को उसका समर्थन करना चाहिए। वह कहते हैं कि स्वामि दयानंद के ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि स्वंयवर प्रथा जबतक हमारे समाज में रही, आर्यवर्त ऊंचाइयों तक गया और जब से यह समाप्त हुई हमारा पतन शुरू हो गया। समाज में युवा जोड़ों के प्रेम के प्रति सामंती नजरिया कई बार बदले की भावना से भी प्रेरित होता है। ऐसा लगता है कि हीर रांझा के किस्से सुनकर यहां किसी वारिस शाह की आंखें नहीं भीगती। हरियाणवी फिल्म चंद्रावल भी दुखांत प्रेम कहानी पर आधारित फिल्म थी, जो यहां सुपर हिट रही। जो किस्से हमारा मनोरंजन करते हैं, वे क्या हमें सबक नहीं देते। वेदपाल जैसा हर किस्सा अपने पीछे सबक छोड़ जाता है, असर आएगा मगर धीर-धीरे।
(जैसा कि हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के शुक्रवार के अंक में प्रकाशित)

Thursday, July 23, 2009

ग्रहण तो यह था

चंडीगढ़ के सेक्टर ४७ स्थित सरकारी मॉडल स्कूल में बारहवीं कक्षा के ११ क्षात्रों को फिजीकल एजुकेशन के टीचर द्वारा जूतों की माला पहनाए जाने का मामला सामने आया है। परिजनों की शिकायत के बाद डीपीआई स्कूल ने जांच के लिए कमेटी गठित कर दी। शिक्षक कर्मजीत राणा का बर्खास्त किए जाने की भी जानकारी है। इसी तरह शहर के प्रसिद्ध सेंट जॉन स्कूल में तीसरी कक्षा के छात्र को सात का पहाड़ा न सुनाने पर क्लास में बुरी तरह पीटा गया। बच्चे अक्षय सिंह की मां पुनिता सिंह चाइल्ड काउंसलर है। बच्चे का कहना है कि उसे बाल पकड़ कर बुरी तरह पीटा गया और उसे लड़की जैसा कहा गया। लड़के की मां का कहना है कि मैं स्कूल में बच्चों के कैसे हैंडल करना है, बताती हूं और मेरे ही बच्चे की इस तरह पिटाई होना बेहद अफसोसजनक है। यदि बच्चे को पहाड़ा नहीं आता था तो इसकी शिकायत अभिभावकों से की जानी चाहिए। पहाड़ा न आने का मतलब मारना नहीं होता। यह खबर आप हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के वीरवार के अंक में विस्तार से पढ़ सकते हैं।

Wednesday, July 22, 2009

अभिन्नता

-ओम राघव
अभिन्न से भिन्न होते ही
समय ने करवट बदली
बदला काल, शीतल लालिमा
चकाचौंध बन पूर्व दिशा बदले यथा
भाष्कर की लालिमा क्षितिज को छोड़कर जाने लगी
मिलन से पूर्व की प्रार्थना
प्रार्थना का सफर
सहचर्य में नहीं पड़ा खलल
मांगा न कुछ- हो प्रसूत अविश्वास जिससे
न लेना भला और न देना भला
मन का देवता, न कुछ चाहिए
जहां सब कुछ सामान्य है
विश्वास खोकर अविश्वास मिलता
शांति की भेंट कोलाहल पर चढ़ गई
सुनामी लहर जैसी आगे बढ़ गई
तीव्र वेग-रोक पाये कौन उसको
अविश्वास का प्रतिकार
प्रारब्ध प्रसूत संस्कार
क्षमता घटना बदले अघटना में
गीता के ब्रह्म वाक्य सा
न करेगा-युद्ध अर्जुन-कौरव सेना बच सकेगी
शरीर नश्वर नष्ट होंगे
संस्कार वस , स्वभाव बरबस लगा दे कार्य पर
जिसक न तू करना चाहता
अभिन्नता का ग्यान हो
फिर भिन्नता कैसी?
जन्म कैसा? मृत्यु कैसी?
क्लेश कैसा?
जब नहीं भिन्नता
ईर्ष्या अहंकार क्रोध कैसा?
और किस पर?
दीखता भिन्न वह स्वयं है।
अभिन्नता ही ग्यान, आनंद, मोक्ष है
समझभर की देर
नसमझभर का ही फेर है।।

साभार http://dadajikablog.blogspot.com/

प्रशासन के माथे का कलंक

यहां के नारी निकेतन में एक मंदबुद्धि लड़की से निकेतन के ही पुरुष कर्मचारियों ने बार-बार बलात्कार किया। इस लड़की को बाद में आश्रय में शिफ्ट किया गया तो यह खुलासा हुआ कि लड़की गर्भवती है। अब गर्भ में पल रहे बच्चे के भविष्य को लेकर हाईकोर्ट ने पीजीआई की कमेटी को विचार करने का समय दिया। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंप दी। इस पर हाईकोर्ट ने गर्भपात की इजाजत दी। इस फैसले को आरोपी पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया की बच्चे का गर्भपात नहीं किया जाना चाहिए। नारी निकेतन की व्यवस्था चंडीगढ़ प्रशासन की जिम्मेवारी है। हो सकता है कि उस मंदबुद्धि को बच्चे को लेकर कोई खास बोध न हो मगर यह सारा घटनाक्रम चंडीगढ़ प्रशासन के लिए शर्मनाक है। यह उसके लिए कलंक जैसा है।

कौन प्रथम

-ओम राघव
भाष्कर होगा उदय-अभी देर है
निकल पड़े घर से- चरवाहा मजदूर किसान
चाह पाले खेत करने काम करने
मिले जो भी काम-
घर पुताई या रंगाई, फसल की हो कटाई
कारखाने की सफाई
जो भी काम हो करेगा, दिन के अवसान तक
खेत जोते फसल बोई, कभी अधिक वर्षा
खरपतवार सूखा कभी टिड्डीदल ही खा गया
जमींदार बना पर मजदूर हो गया
न खाने का पूरा पड़ा, लगान देना रह गया
घर से निकला सदा, सूरज से बहुत पहले
नवजात शिशु अनजान-बाप के अस्तित्व से
जंगल की हो कटाई या कारखाने की सफाई
मालिक की रहे सलामत मुटाई
स्वयं लक्कड़ काट काठ बन गया
नहीं बनना चाहता अधिक धरती का बोझ
काम ही नियती बना उसकी
जीवन यापन की भरपाई हो सके
कार्य विनिमय से बस इतना चाहता
बच्चे पल सकें पढ़ सकें
उनके ब्याह चिंता से हो सके मुक्त
इसी को मान लेता परम मुक्ति
जीवन के पार मुक्ति का
उससे कोई सरोकार नहीं
अवसर ही नहीं उससे अधिक सोचने का
उसके निकलने के बाद
निकलता है दिन
कौन निकलता है प्रथम
पता अब चल गया है?
(5 नवंबर 2003)

Tuesday, July 21, 2009

चंडीगढ़ में सुबह अस्सी फीसदी तक सूरज नहीं दिखेगा

इस सदी का सबसे अधिक अवधि का सूर्य ग्रहण बुधवार को सूर्योदय के साथ ही साढ़े पांच बजे से चंडीगढ़ में सुबह साढ़े सात बजे तक दिखेगा। इसमें साढ़े छह बजे ग्रहण का चरम होगा, जब सिर्फ २० फीसदी सूरज ही आपको दिखेगा। चंडीगढ़ में पीयू के फिजिक्स विभाग में इसे देखने के लिए टेलिस्कोप सेट किए गए हैं। अधिकतम २०० लोग इसे देख सकेंगे। हालांकि मानसून के चलते बादल छाए होने से इसे देखने में दिक्कत आ सकती है। सुबह का ग्रहण देखने में आसानी रहेगी। उगता सूरज पहले पांच दस मिनट का तो लोग वैसे भी नंगी आंख से देख लेते हैं, इसके अलावा आप एक्सरे फिल्म से दो-तीन परतों का इस्तेमाल कर फिल्टर भी लगा सकते हैं। ग्रहण के चलते बुधवार को स्कूल भी सुबह साढ़े सात की जगह नौ बजे से खुलेंगे।
अराधना
-ओम राघव
छोड़ मोह-माया को जल्दी, लगजा प्रभु की याद में
रह जाए केवल पक्षतावा, इस जीवन के बाद में
नश्वर ये संसार, छोड़ कर जाना ही होगा
है कई जन्मों का भार, जिसे उठाना ही होगा
हीरे से अधिक कीमती, सांसें खो डालीं
साधन बना शरीर, शीघ्र ही हो जावे खाली
बचपन युवा बुढ़ापा, ऐसे ही खो डाला
दिन खेल-कूद आराम, रात गफलत में सो जाना
बचपन और जवानी खोई, कीमती सांसें भी खोईं
बने उम्र भर कितने रिश्ते, पर रहा नहीं कोई
साधन मिला शरीर, सार्थक है इसको करना
प्रभु की रहे निरंतर याद, रहे फिर कोई डर ना
जीवन यह संसार, स्वप्नवत इसे समझना
है जबतक अग्यान, तभी तक नाटक करना
क्षण-क्षण प्रभु की याद, मंजिल को लाएगी
काम-क्रोध मद-लोभ की भट्टी, नहीं जलाएगी
किसी शब्द से और मंत्र से, प्रभु की याद करो
मंजिल तक पहुंचाएगा, न संशयवाद करो
श्रवण-कीर्तन वंदन, प्रभु का सिमरन करना है
छोड़ सहारा जग का, आत्म समर्पण करना है
आ जाए जब ज्ञान, फिर पर्दा नहीं रहे
होवे नाटक का अंत, पात्र का धंधा नहीं रहे
खुले न अंतरचक्षु, तभी तक माया की सूरत
होवे आत्मा का भान, न मन की रहे जरूरत
मन का सारा खेल, निरंतर तरसाता है
बिन प्रभु की याद, जीव का मन घबराता है
साभार - dadajikablog.ब्लागस्पाट.com

Monday, July 20, 2009

सिरमौर

सिरमौर
-ओम राघव
अंतर भरा अभद्र हृदयहीनता से
आदर्श फिर कैसा? नाता धर्म-भीरुता से
करे उग्र बन विस्फोट बम का
या फिर करे संहार जग का
उसे अपना भद्रतायुक्त चेहरा दीखता
बसुधा है सारी कुटुम्ब आदर्श कैसे सीखत?
उसके लिए आदर्श, नैतिकता, किताबी लेख है
आधुनिकता में जो कंटीली मेख है
होता रहे मानव अहित, भला कौन उसे टोकदे,
ताव किसमें है, जो उसका विजय रथ रोकदे,
कुत्सित मन न दे ठहरने भद्रता को
करे न माने, उस पुरानी मान्यता को
छोड़े पहली मान्यताएं तो प्रगतिशील है
तभी बने आधुनिक डाले न उनमें ढील है
परिणाम है उग्रता, बलात्कार भ्रष्टता,
संहार लाखों का भी है फिर शिष्टता
सर्वनाश कर विश्व अपराजेय बनकर
बना धवल-शील कुछ को विजयी पदक देकर
किए निर्माण दिव्य भवन-धन मन से सजाकर
बढ़ा अहंकार, श्रम-धन-बल मिलाकर
स्वतंत्रता के नीड़ में सांस था जिसने लिया
डाल कर बम मेघसम, जोश ठंडा कर दिया
कथित अशांति दूर कर, दूत शांति के बने
देखो, प्रतिफल में जयजयकार हैं सब कर रहे
सप्ताह के तूफान ने परमार्थ सारा कर दिया
अशांति के बबूलों को मानों शांत कर दिया
शंभु पराधीन कर, हुआ नहीं कृतार्थ क्या?
बड़ा प्रतिकार इससे- दान और पुण्य क्य?
मरहम लगे पीड़ितों को दूर हो अभद्रता
मांगे सबसे उदार मन, निःसंकोच सहायता
न आएगी याद बनेंगी अब भव्य कोठियां
बच्चे भाई पति खोये याद केवल रोटियां
बेरोजगारी दूर होगी इससे बड़ा उपचार क्या
काम अब उनको मिलेगा, जिनको न कोई काम था
वह विजयी भी होगा न क्या शांत एक दिन?
करेंगे याद उसकी रचा था उसने इतिहास एक दिन
समाधी पर चढ़ेंगे श्रद्धासुमन, लगें प्रतिवर्ष मेले
कभी कांपता था विश्व सारा जिसका नाम ले ले
कुत्सित हृदय सोचता सब ठीक ही होता रहेगा
बाद जाने के उसे फिर क्या कोई देख लेगा
आत्मा है अमर हर जीव में विराजती
वह क्या समझा सकेगी-बुद्धि न समझना चाहती
दूसरी व्यक्तित्व देखा, शुभ कर्म लीक पर चला
चाहे अपार कष्ट, सारी जिन्दगी सहता रहा।
मिली सत्ता सम्पदा को दूर ही करता रहा,
आदर्श की वेदी पर चढ़ त्याग सब करता रहा
परिवार पत्नी, पुत्र छोड़े व्यवहार मर्यादित किया
लांक्षन लगे तटस्थ रह निज लीक को सार्थक किया
शान्ति भद्रता व्यवहार में आदर्श अवश्य बन गया
मर्यादा में बंधा, सर्वमान्य वह उत्तम पुरुष बन गया।

साभार - dadajikablog.blogspot

Sunday, July 19, 2009

पीजीआई का डाक्टर स्वाइन फ्लू लेकर लोटा

लोग अमेरिका और इंग्लैंड से स्वाइन फ्लू लेकर वापस लौट रहे हैं। शनिवार को पीजीआई के सीनियर रेजिडेंट को स्वाइन फ्लू की पुष्टि हुई है। एक्सपेरिमेंटल मेडिसन के ये रेजीडेंट यूके में कान्फ्रेंस में भाग लेने गए थे। लौटने पर फ्लू के लक्षण दिखने पर इन्हें आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कराया गया। दिल्ली भेजे गए सैंपल में इन्हें स्वाइन फ्लू की पुष्टि हुई। २९ वर्षीय यह डाक्टर अब पीजीआई में अपना इलाज करवा रहे हैं।
इसी तरह सेक्टर ११ ए की एक पचास वर्षीय महिला में भी स्वाइन फ्लू होने की पुष्टि हुई है। यह महिला ४ जुलाई को सिंगापुर गई थी। १३ जुलाई को फ्लू के साथ चंडीगढ़ वापस लौटी। उसे भी आइसोलेशन वार्ड में भर्ती किया गया है।

प्रसन्नता

-ओम राघव
प्रश्न

प्रसन्न कैसे रहें जग में
हर कोई यह चाहता
प्रसन्न रहने का सूत्र
खोज से भी नहीं मिलता
निर्देशित मार्ग होता सीधा
पर वह कभी सीधा न लगता
डिगा है विश्वास, तो श्रद्धा बनेगी कैसे?
उत्तर
लाभ सुख-शांति का है, जिनसे मिलता
अमर फल-प्रसन्नता प्राप्त जिससे
दिखता वह आकाशी फूल है
प्रसन्न हों दूसरे की प्रसन्नता में
बने वह प्रसन्नता का सदमूल है
धकेलते कर्त्तव्य पीछे अधिकार बस चाहते
करे कर्म दूसरा, मिले फल हम चाहते
सोच-निष्कर्मता से, लाभ ही हमको मिलेगा,
सदा के वास्ते ही, अधिकार फल हम को मिलेगा
सदा मिले सुख-लाभ, सोचना ही भूल है,
कर्मनिष्ठ होना कारण प्रसन्नता का मूल है
अब सुख-लाभ क्या? यह अंतर की ही सोच है
सकारात्मक सोच हो, न दुख और सुख शेष है
स्वप्निल संसार में, रहेंगे जब तक,
कलेश तीन हमको सताएंगे,
रस्सी को समझे सर्प, भय का बनेगा भूत
सभी मिलकर हमको डराएंगे
पर्दा सत्य से हटेगा नहीं जब तक
स्वप्निल संसार से ऐसे ही ठगे जाएंगे
सब कुछ धन सम्पन्ति से है मिलता
पर शांति-सुख सम्पदा नहीं मिल पायेगी,
खोजने पर पाओगे-प्रसन्नता के स्वयं स्रोत हो
वह अंतर की बुद्धि-मन, आत्मा दे पायेगी।

साभारhttp://dadajikablog.blogspot.com/

Saturday, July 18, 2009

प्रशासन ने चंडीगढ़ में पैदा की नई समस्या

चंडीगढ़ प्रशासन की रचनाधर्मता गजब की है। कई बार वह एक समस्या को सुलझाने के लिए बड़े अजीब तरीके निकालता है और एक नई समस्या खड़ी कर देता है। शहर में करीब आठ लाख वाहन पंजीकृत हैं। इसके चलते पार्किंग की समस्या हमेशा बनी रहती है। पार्किंग में कम जगह होने पर वाहन सेक्टरों की पार्किंग में बनी फायरलेन में भी पार्क कर दिए जाते हैं। अब प्रशासन की आंख खुली या किसी अधिकारी को पार्किंग से अपना वाहन निकालने में दिक्कत आई होगी, इसलिए बिना विचारे फरमान जारी कर दिया कि पार्किंग में निर्धारित संख्या से ज्यादा वाहन नहीं खड़े हो सकते। इसके लिए वीरवार से चालान काटने शुरू कर दिए गए। शुक्रवार को पार्किंग वालों ने हाउस फुल के बोर्ड लगा दिए। इस पर जो लोग बाजारों में काम के लिए आए उन्हें काफी दिक्कत हुई। पार्किंग के अंदर गाड़ी जाने नहीं दी जा रही थी। कुछ जिन्हें ज्यादा जरूरत थी उन्होंने बाहर सड़क पर ही गाड़ी पार्क की तो चालान कर दिया गया। गाड़ी उठा ली गई। इस तरह सेक्टर ८ और ९ के बाजारों में आए लोगों ने खूब परेशानी झेली। सेक्टर २२ में भी यही हाल रहा। शनिवार के अखबारों के लिए यह प्रमुख खबर रही।

Friday, July 17, 2009

द्वैत या अद्वैत

-ओम राघव
अद्वैतवाद
न था पहले कभी और न पीछे रहता है
दृष्य प्रकृति पदार्थ स्वप्नवत मिथ्या होता है
भ्रम वर्तमान सत्ता है मिथ्या केवल भासती
जीव सत्ता ब्रह्म है जन्म होकर दीखती
जीव संग्या जन्म से पर होती ब्रह्म है
जन्म मरण से परे सत्य ही ब्रह्म है
अदर्शन आत्मा पुनः अदृश्य हो जाएगी
जीव जन्म ले बार बार ब्रह्म में सो जाएगी
चिंतन में आती नहीं, इन्द्रिया-नीत आत्मा
करता रहा जीव ही अजन्मे ब्रह्म की उपासना
महाकाश घटाकाश जैसे कल्पित भेद हैं
आकाश है सर्वत्र व्यापक शेष कल्पित भेद है
कर्म धर्म का अभाव बन जाता परमार्थ है
हंसना-मरण जीवन मृत्यु इनका न कोई अर्थ है
चिन्गारी प्रगटे अग्नि से, अग्नि का ही अंश है
ब्रह्म से नहीं प्रथक जीव, वह ब्रह्म का ही अंश है
दुखी जीव देह के संयोग से, असंयोग जीव ब्रह्म है
काम-क्रोध, राग-शोक, देह-मन के धर्म हैं
प्रकृति-जगत है भ्रम सदा-वस्तविक सत्ता नहीं
संकल्पित है ब्रह्म से, क्षीण प्रलयावस्था कहीं
आत्मा ही सनातन कण-कण में ओतप्रोत है
अपार अप्रमेय, उसका प्रकाश ही स्रोत है
द्वैतवाद
ब्रह्म प्रकृति जीव सत्ता आदि से है मानते
बिना जिनके सृष्टि का आकार कैसे जानते
द्रव्य के प्रकार से एक जड़ दूसरा है अजड़
प्रकृति है सारी जड़, आत्म-ईश्वर अजड़
प्रकृति व जीव दोनों, ईश्वाराधीन हैं
पर हैं दोनों भिन्न सत्ता, होती न ब्रह्मलीन है
जीव अणु अधिसंख्य में होता प्रकट
ब्रह्म उपासना से मुक्त हो, होता है फिर अप्रकट
जीव रहे निम्न ही, जब तक न करे स्वः को प्रकट
ब्रह्म दोषों से रहित, जीव दोषों का भरा घट
मत-मतान्तर देख, प्रश्न बुद्धि से करता रहा है
पाया न हल आदिकाल से, वह उलझता ही रहा है
मन-वाणी से जो अगोचर, पाओ तुम कैसे उसे
है अखंड परम सत्ता, सत्य कहते हैं जिसे
विचार व कर्म अच्छे, गर परोपकार सीखले
सदा दूर हिन्सा से रहें, सबसे प्यार करना सीख ले
नैतिक जीवन मार्ग ही, सच्ची बने उपासना
निकट है परम धाम-मोक्ष, रहे न शेष कल्पना।
(२७ सितंबर २००३)
साभारhttp://dadajikablog.blogspot.com/

चंडीगढ़ के बारे में पढ़ें आईएमएनइंडियन-बकबक का अनुभव


चंडीगढ़ से एक मुलाकात अभी हाल में चंडीगड़ जाने का मौका मिला । बड़ा ही ख़ूबसूरत शहर है। चारो तरफ़ हरियाली, सब कुछ हरा- हरा। साफ सुथरा, आपको भ्रम होगा कि आप किसी विदेश में है। चंडीगढ़ में इन्सान को एक बार जरूर जाना चाहिए।चडीगढ़ प्रेस क्लब कि तो बात ही और है उनका अपना स्वीमिंग पूल है। मेरे ख्याल से यही एक समृद्ध प्रेस क्लब होगा पूरे भारत वर्ष में। चंडीगढ़ का सेक्टर १७ का मार्केट बहुत बड़ा और प्रसिद्ध है। काफी लंबा फैला हुआ है।

सभार http://imnindian-bakbak.blogspot.com

बात और बेबात

-सुधीर राघव
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में यह मुहावरा चलता है- आदमी की बात और गधे की लात का कोउ भरोसा नाय। कब चल जाए और कुछ मतलब भी न निकले।हमने तभी कही ही कि बात पर जादा भरोसा मत करो।इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में ही बात का सबसे ज्यादा बतंगड़ बनता है। बेशक बात भले की हो चाहे नुकसान की बतगंड़ जरूर बनेगा। अमिताभ जब बोले कि यूपी में दम है तो बतंगड़ बना। वरुण ने कुछ काटने की बात कही या नहीं कही (कोर्ट फैसला करेगा) पर बतंगड़ खूब बना। अब रीता बहुगुणा के बयान पर खूब बवंडर है। यहां नेता बता बनाकर ही चुनाव जीत लेते हैं। काम को कोई नहीं पूंछता। यही वजह है हर कोई दूसरे को बोलने से रोकता है। इसलिए यह मुहावरा भी खूब प्रचल्लित है - काहे गाल बजाते हो, हमको सब मालूम है। या बहुत ग्यानी बनते हो। अभी ---पर गोली मारेंगे और सारा ग्यान वहीं कूंच देंगे। यह बातें सिर्फ गली मोहोल्लों में ही नहीं लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में भी होती हैं। भले ही इस शहर को तहजीव और मीठी जुबान के लिए जाना जाता हो मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लठैत बोली ब्रज के बंधन तोड़ यहां ठेठ गंवई अंदाज में चलती है।उसके बाद महिलाएं एक-दूसरे को बलात्कार की धमकी देती हैं। भली मानुष हुईं तो माफी भी मांग लेती हैं। मायावती हुई तो इसकी जरूरत भी नहीं। वह किसी दूसरे को गाल नहीं बजाने देंगी। अगर कोई उनकी सी बोली बोलता है तो सामंती ठसक दिखादी जाती है। वरुण जेल काट चुके हैं। रीता बहुगुणा जेल में हैं। संजय दत्त डर कर भाग ही गए थे।उत्तर प्रदेश में जो गाली-गलौच का कल्चर सिर चढ़ कर बोल रहा है, वह बताता है कि देश के यान भले चांद पर पहुंच जाए अभी उन्हें विकास योजनाओं से कोई बहुत ज्यादा लेना-देना नहीं है। उनके लिए पत्थरों के बुत अब भी मायने रखते हैं। मायावती उसी भावना की झलक है, जिसे उत्तर प्रदेश की जनता ने सर्वसम्मति से चुना।

जिसका पति अफसर उसका भी बड़ा नाम है...

अपने पति या रिश्तेदार के रसूख के दम पर हरियाणा और पंजाब की महिला शिक्षक वर्षों से चंडीगढ़ के कालेजों में डटी हैं। जबकि नियम यह कहता है कि कोई भी व्यक्ति अपने पेरेंट स्टेट से सिर्फ तीन वर्ष के लिए ही चंडीगढ़ में रह सकता है। कुछ मामलो में तो ऐसे भी टीचर हैं जो पिछले ३३ साल से डेपुटेशन पर चंडीगढ़ में डटे हैं। हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान टाइम्स चंडीगढ़ में शुक्रवार को छपी रिपोर्ट के मुताबिक गवर्नमेंट कालेज फार गर्ल्स-११ और पोस्ट ग्रेजुएट कालेज-११ में कई वीआईपीज की पत्नियां हैं। इनमें से कोई तो पैरेंट स्टेट में ज्वाइनिंग के छह महीने बाद ही डेपुटेशन पर चंडीगढ़ आ गई। यूटी के उच्च शिक्षा निदेशक डीके तिवारी इस संबंध में कहते हैं कि हम पैनल मंगा कर नियुक्तियां करते हैं, जो तीन साल से ज्यादा समय से डटे हैं, उन्हें डेपुटेशन का अतिरिक्त एलाउंस नहीं दिया जाता, जो बिना एलाउंस के रहना चाहता है, वह रह रहा है।

जिसका पति अफसर उसका भी बड़ा नाम है...

अपने पति या रिश्तेदार के रसूख के दम पर हरियाणा और पंजाब की महिला शिक्षक वर्षों से चंडीगढ़ के कालेजों में डटी हैं। जबकि नियम यह कहता है कि कोई भी व्यक्ति अपने पेरेंट स्टेट से सिर्फ तीन वर्ष के लिए ही चंडीगढ़ में रह सकता है। कुछ मामलो में तो ऐसे भी टीचर हैं जो पिछले ३३ साल से डेपुटेशन पर चंडीगढ़ में डटे हैं। हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान टाइम्स चंडीगढ़ में शुक्रवार को छपी रिपोर्ट के मुताबिक गवर्नमेंट कालेज फार गर्ल्स-११ और पोस्ट ग्रेजुएट कालेज-११ में कई वीआईपीज की पत्नियां हैं। इनमें से कोई तो पैरेंट स्टेट में ज्वाइनिंग के छह महीने बाद ही डेपुटेशन पर चंडीगढ़ आ गई। यूटी के उच्च शिक्षा निदेशक डीके तिवारी इस संबंध में कहते हैं कि हम पैनल मंगा कर नियुक्तियां करते हैं, जो तीन साल से ज्यादा समय से डटे हैं, उन्हें डेपुटेशन का अतिरिक्त एलाउंस नहीं दिया जाता, जो बिना एलाउंस के रहना चाहता है, वह रह रहा है।

साइलेंस जोन में ही ज्यादा ध्वनि प्रदूषण

चंडीगढ़ ध्वनि प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। यहां तक की पीजीआई और अस्पतालों के साइलेंस जोन भी इससे मुक्त नहीं हैं। ध्वनि प्रदूषण के लिए जुटाए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पीजीआई और उसके आसपास के १०० मीटर के दायरे में शोर काफी ज्यादा है। साइलेंस जोन के लिए दिन में अधिकतम ५० डेसीबल की सीमा और रात के लिए ४० डेसीबल है। मगर हालत यह है कि पीजीआई की इमरजेंसी में ही शोर ७३.७ डेसीबल आंका गया है। न्यू गाइनी ओपीडी ब्लाक में ७३.४ डेसीबल है। यह ध्वनि प्रदूषण औद्योगिक क्षेत्र के मानक के करीब है। मैन गेट के पास यह ८६.८ डेसीबल है। हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में शुक्रवार के अंक में पीजीआई के अन्य क्षेत्रों में शोर के स्तर के आंकड़े विस्तार से दिए गए हैं।

यही नहीं पार्कों में भी शांति नहीं है। रोजगार्डन में शोर ५६.४ डेसीबल आंका गया है। यही टैरेस गार्डन, शांतिकुंज, बोगन विलिया गार्डन और सेक्टर ४६ के पार्क में अगर ६० डेसीबल से ज्यादा है तो सेक्टर ३० के पार्क में सत्तर डेसीबल से भी ज्यादा है। इसके अलावा बाजारों का तो कहना ही क्या कहीं भी शोर साठ डेसीबल से कम नहीं है।

उधर ईएनटी विशेषग्यों का कहना है कि साठ डेसीबल और इससे ज्यादा का शोर स्थाई बहरापन दे सकता है। अगर आप साठ डेसीबल शोर में लगातार आठ घंटे काम करते हो तो बहरे हो सकते हो। इसी तरह अस्सी डेसीबल शोर में लगातार तीन घंटे काम करने पर स्थाई बहरापन हो सकता है। इसका इलाज भी मुश्किल है।

Thursday, July 16, 2009

विस्मृति

-ओम राघव
जब से बिछुड़े भोगे हैं लाखों जन्म
कितने नाटक हम कर चुके हैं
पुत्र पौत्र बाप कितने रिश्ते अनाम
कब तक जिए क्या-क्या रूप धर
पाप-पुण्य के घट भर चुक हैं
शरीर कैसा कर्म कैसे
जीना कब तक रहा
विस्मृति की गोद में सब सो गया
त्रिगुण के मेल से आनंद या कष्ट भोगा
विगत पाये जीवनों में
मानों सभी कुछ खो गया
गर वो सब याद रहता
कैसा यह वर्तमान लगता
जीने का उपचार मिलता
साथियों को याद आती
वर्तमान को भुलाती
फिर क्या जीवन इतना सहज होता?
यौनिया बताते हैं लाख चौरासी
जीव जिनमें घूमता है
समुद्री लहर के माफिक
कई जन्म पापड़ बेलता है
मानव बना जो जीव
वही केवल सोचता है
कर्म बुद्धि ग्यान की मानव यौनि
शेष सब तो भोग यौनिया
दुख दर्द एवं भ्रांति की ही सारी यौनिया
गर विस्मृति साथ होती
मनुज कर पिछली याद रोता
न पाता चैन दिन में
न आराम से रात सोता
ग्यान तक चक्र गर चल गया
भेद सारा खुल सकेगा
हर जन्म आगे बढ़ने का है रास्ता
युगों पहले छोड़ कर जो भूल की है
हर जन्म की कोशिश मंजिल पर ले जा सकेगी
शरीर तीनों इंद्रिया मन बुद्धि
जब आत्मा में जा टिकेगी
प्रयत्न नहीं अब तक किया
वह निश्चय ही करना पड़ेगा
बिछुड़े हुए हैं, जहां से
वहां पर ही जाना पड़ेगा
कभी जो जहां से चला है
लौट कर वहीं आना पड़ेगा
अब तक शांति की खोज जो हुई है
आए हो जिस मुकाम से
वहीं जाना पड़ेगा
(१५ अगस्त २००३)

साभारhttp://dadajikablog.blogspot.com/

चंडीगढ़ में बनेगा एक और सेक्टर

चंडीगढ़ में सेक्टर ६३ की आवासीय योजना तैयार हो गई है। इसके लिए ४४० करोड़ रुपए की राशि मंजूर की गई है। नई आवास योजना के तहत २१०८ मकान बनाए जाने हैं। अखबारों में छपी रिपोर्ट के अनुसार इस योजना के लिए ड्रा छह महीने पहले ही निकाल दिया गया था। इन्वायरमेंट क्लीरिएंस न होने के चलते यह मामला लटका हुआ था।
स्कूल बस ऑपरेटर पहुंचे हाईकोर्ट - चंडीगढ़ के निजी स्कूल बस ऑपरेटरों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनका कहना है कि प्रशासन उन्हें तंग कर रहा है। मामला बसों में स्पीड गवर्नर लगाने और १५ साल से ज्यादा उम्र की बसों को रिटायर करने का है।

चिड़िया

-ओम राघव
कभी पास में, कभी दूर ही
अपना नीड़ बना लेती हो
थोड़ी सी भी आहट पाई
चिड़िया तुम झट उड़ लेती हो
प्यार से चुनकर दाना-तुनका
नहीं किसी से तुम लड़ती हो
विश्वास नहीं जग प्राणी का
उड़ होशियारी कर लेती हो
सुन लेती सब जग की बातें
नहीं किसी से कुछ कहती हो
श्रम को करना और खुश रहना
जुगाड़ जीविका कर लेती हो
सूखा वर्षा ओले मानव
शत्रु सारे बने हुए हैं
बचना उनसे कठिन तुम्हारा
जाल सभी ने बुने हुए हैं
प्रात उठ हिलमिल कर चलना
सीखे मानव सिखलाती है
बनकर साथी रहना कैसे?
सारे समाज को बतलाती है
प्रेम प्यार निष्काम भाव से
सब बच्चों को बहलाती है
चिड़िया पक्षी किसी तरह की
चालाकी न दिखलाती है
रोटी-चावल खाए जो प्रेम से डाले
बच्चों का खिलौना भी बन जाती
घर करे निर्माण, कर सामान इक्टठा
कहां-कहां से वह ले आती
खाना-पीना चलना-फिरना
बच्चों को सभी सिखा देती है
करना मेहनत प्रात से छिपते दिन तक
बच्चों को पाठ पढ़ा देती है
केवल अपना ही नहीं
बच्चों का पहले पेट भरेगी
लायक बच्चे नहीं हो जाते
तब तक उनके काम करेगी
सारी जिम्मेदारी मां की
चिड़िया पूरी कर जाती है
प्रकृति मानव के गुण सारे
बच्चों में अपने भर जाती है
अपने समाज की मानव समान
जिम्मेदारी पूरा करती
हटते पीछ कभी न देखा
दुख बच्चों के सारे सहती
अजब करिश्मा यह कुदरत का
घर जंगल सबकी रौनक बन जाती है
प्रकृति को कुछ समझे मानव
चिड़िया मानो बतलाती है।
चिड़िया रंग-बिरंगी कई ढंग की
नीली-पीली लाल-सुनहरीनाम निराले, आवाज सुरीली
गौरेया तोता और टिटहरी
कौआ चातक सारस बत्तख
बटेर तीतर मोर व गलगल
जिनका है संगीत अनूठा
गाये मानव बिना शोर
केवल मन ही मन।।
(५ जुलाई २००३)
साभारhttp://dadajikablog.blogspot.com/

Wednesday, July 15, 2009

चंडीगढ़ में एफआईआर ऑनलाइन

चंडीगढ़ के थानों में दर्ज होने वाली एफआईआर और डीडीआर को अब ऑन लाइन किया जा रहा है। यह सारा काम कॉमन इंटीग्रेटेड पुलिस एप्लिकेशन यानी सीपा नामक सॉफ्टवेयर के जरिए संपन्न होगा। इसके साथ ही चंडीगढ़ पुलिस देश की पहली पुलिस बन गई है, जो सारा काम सीपा पर करेगी। इस तरह अपराधियों का सारा ब्यौरा भी महज एक क्लिक पर उपलब्ध होगा। छपी खबर के मुताबिक एसएसपी एसएस श्रीवास्तव ने हिन्दुस्तान चंडीगढ़ को बताया कि इससे काम में पारदर्शिता के साथ ही अपराध और अपराधियों पर कड़ी नजर रखी जा रही है।

संवेदना जंगल की

-ओम राघव
मेर आस्तित्व को निगलती
दिल की गहराई में पैठ
दर्द की आग
कब कहां कैसे?
उजड़ा यौवन मेरा
टीस उठती-
निरन्तर प्राप्त वृद्धि-समृद्धि को जिसकी कामना
उजाड़ कर अस्तित्व मेरा
बनकर सदी का एडवान्स्ड मानव
पूर्णविराम पायेगी क्या कभी
इसकी कामना?
आचरण का शुभ-चिंतन कहां
जब आचरण हीन मानव हो रहा है
प्रश्न-चिन्ह रहेगा क्या अस्तित्व मेरा
शेष चेहर?
हुआ अस्तित्व हीन मैं
अस्तित्ववान क्या मानव रहेगा
क्या प्रश्न यह उठता नहीं है
होगा वातावरण प्रदूषित-
मानवता काल-कलवित
इन्द्रिया-रोम मेरे
है नीम पीपल तालड़ केला
कीकर खजूर ढाक बेला
कतारें-सेब अखरोट बदाम अनार वाली
अनेक जिन्सें बेल डालें अंगूर वाली
घास वनस्पति लाल पत्थर
अमोल लकड़ी संगमरमर
लोंग इलायची मिर्च काली
तेज पत्ता बेल पत्ती चायवाली
अबरक कोयला और लोहा
हीरा पत्थर मैगनीज सोना
मिट्टी-पत्थर से बनी अट्टालिकाएं
किले मंदिर मसजिद भव्य बनें सारी दिशाएं
करते सामान्य पर्यावरण जन्तु ऐसे
कीड़े-मकौड़े शेर हाथी जीव जैसे
रीछ मृग खरगोस चीते
व्याल अजगर सब जीव जीते
कलरव सुघड़ पशु पक्षियों का
करता दिन-रात मंगल
मानव काटता दिल मेरा
काटकर पहाड़ और जंगल
चाहता हूं स्थायित्व मानव का
उसे न कभी दुख की आग निगले
स्वयं से नहीं सीख सकता
मुझसे ही कुछ सीख ले ले।
मानव ने जीव मारे जन्तु मारे
वृक्ष काटे दॉंत काटे
सींग- हाड़ खाल बेच और बांटे
बेचकर व्यापारियों को
धन कमाया
पर न छोड़े - फर न छोड़े
बाजार पूरे भर दिए
दुस्साहस यही मानव का रहा
कर अस्तित्वहीन मुझको
पर स्वयं को भी मानव
कंगाल क्या नहीं कर रहा?
(३ जुलाई २००३)

साभारhttp://dadajikablog.blogspot.com/

Tuesday, July 14, 2009

गुलाम की सोच

-सुधीर राघव
मंदी के दौर में जनसंख्या नियंत्रण का नारा एक बार फिर जोर-शोर से उठ खड़ा हुआ है। जाहिर है एक अरब आबादी की जिम्मेदारी जिस सरकार को लेनी पड़े उसके पसीने छूट जाएंगे। एक अरब पेट और खाने के लिए खुले मुंह सचमुच अनाज, फल, सब्जियों की एक बड़ी मात्रा की रोज मांग करते हैं। इनके साथ जुड़े दो हाथ तो हैं पर सरकार को यह भी फिक्र होगी कि इन हाथों को काम क्या दिया जाए। जब दुनिया की अरथव्यवस्थाएं कुलाचें भर रही थीं, उस दौर में हम दुनिया को कामगार मुहैया करा रहे थे। अब मंदी की वजह से उन्हें भी लौटना पड़ रहा है। नए अवसर तो बहुत ही कम हो गए हैं। ऐसे में जनसंख्या नियंत्रण का नारा फिर उसी तेजी से उठा है जैसा ९० के दशक से पहले उठता था। जनसंख्या वृद्धि दर नियंत्रित होनी ही चाहिए। पर यह नियंत्रण कैसे हो इस पर लोगों के पास पिछले पांच दशक से ढेरों सुझाव हैं। संजय गांधी भी इस मामले में कुछ लोगों के आदर्श हो सकते हैं, जो ७६-७७ में जबरन नसबंदी के लिए बदनाम हुए। इसके अलावा परिवार नियोजन या परिवार कल्याण विभाग की पूरी फौज इस दिशा में वर्षों से काम कर रही है। नतीजा क्या निकला है, वह सबके सामने है। ऐसे में हमारे गुलाम नबी आजाद मंत्रिपद का दायित्व निभाते हुए कुछ नई बात कह गए हैं। गुलाम नबी कह रहे हैं कि गांवों तक टीवी पहुंचा दीजिए, फिर देखिए जनसंख्या कैसे नियंत्रित होती है। यह बात लोगों क्या बुद्धिजीवियों और धर्मजीवियों के गले भी नहीं उतर रही है। यह माना जाता है कि जहां मनोरंजन के साधन नहीं होते, उन जगहों पर जनसंख्या तेजी से बढ़ती है। टीवी देखने के लिए बच्चे और लोग देर रात तक जगेंगे। नहीं यह एक कारण नहीं है। टीवी आप तक सूचनाएं भी पहुंचाता है। वह अवांछित गर्भ से छुटकारा पाने के तरीके भी बताता है। हालांकि बहुत से धर्मों में इसे वर्जित माना जाता है। गर्भपात जैसे जटिल उपाय सचमुच कट्टर समुदायों में कोई भी स्त्री चाहकर भी नहीं अपना सकती, मगर ७२ घंटे वाली गोली, जिसमें गर्भ सुनिश्चित ही नहीं है, उन्हें बिना अपराधबोध के साथ इसे अपनाने की राह दिखा सकती है। टीवी अपने साथ यह सूचना लेकर आता है। हो सकता है घर में रोज यह सूचनाए तो लोग इसे आजमाएं भी। जानकारियां हमेशा लोगों का बुरा नहीं करती, जैसा कि कट्टरपंथी मानते हैं। उन्हें हर नई जानकारी के नकारात्मक प्रभाव ही नजर आते हैं। चुनौतियों से निपटने में हमेशा पुराने उपाय कारगर नहीं होते। इसके लिए नए तौर-तरीके अपनाए ही जाने चाहिए। संचार क्रांति का पूरा फायदा गांवों तक पहुंचे। वहां भी बिजली-पानी और कैमिस्ट की दुकान तक पहुंचने के लिए सड़कें और साधन हों तो जाहिर है, आबादी नियंत्रित होगी।

जड़ माया

-ओम राघव
कितन युग आए, बीत गए,
काल-देश में आकर माया ऐसी लिपट गई,
छूटा नहीं देश, ममता ऐसी लिपट गई।
युग-वर्ष सारे जीवन के रीत गए,
महल-हवेली-जमीं देख जायदाद को,
सोना-चांदी, रुपए-पैसे शान को।
इस जड़ माया ने सब जीत लिए,
बाबा-दादी माता-पिता-पुत्र परिवार से,
मोह न बिल्कुल छूटा पर सब छूट गए।
मालिक-परमेश्वर की भक्ति न हो सकी,
मोह-माया से सदा आत्मा ठगी।
रुकावट-मिलने में जड़ चेतन माया हो गए।
सद्पयोग भी न कभी माया का किया,
संतों की संगत न ध्यान रब का किया।
केवल दिन-बरस नहीं कई युग ऐसे बीत गए।
(३ नवंबर २००२)
साभारhttp://dadajikablog.blogspot.com/

Monday, July 13, 2009

फिजा को देखा तो ऐसा लगा...

इस जंगल से मुझे बचाओं में चंडीगढ़ के दो चेहरे आज सोनी टीवी पर देखने को मिले। इनमें एक चंद मोहम्मद से इश्क के बाद धर्म बदलकर चर्चा में आई फिजा और दूसरी रोडीज में अपनी गालियों के चलते मशहूर हुई पलक। जाहिर है, फिजा के होने का मतलब इस रिएलिटी शो के आयोजकों के लिए ग्लेमर का तड़का ही है। पहले ही एपीसोड में उसे झरने में नाहते हुए और मालिस करवाते दिखाया गया। जब राखी सावतं का स्वयंवर चर्चा में है तो फिजा का यह रूप ही टीआरपी बढ़ाने का नुस्खा हो सकता है। पलक तो फिजा के आगे यही कहती नजर आई-दीदी मुझे इस जंगल से बचाओ। दूसरी ओर चांद मोहम्मद और चंद्रमोहन का हाल क्या है, शायद यह सबको न मालूम हो। जिस दिन फिजा इस जंगल की शूटिंग के लिए निकली, उसी दिन चांद का कुल्हा टूटने की खबर भी आई। सुना है वह दिल्ली के अपोलो अस्पताल में अपना इलाज कर रहे हैं। सुना है फिजा उन्हें देखने अस्पताल भी नहीं आ सकीं। चांद अगर टीवी देख रहे होंगे तो उनके मुंह से यह जरूर निकला होगा- उनके देखने से आ जाती है चेहरे पर रौनक, वो समझते हैं, मरीज का हाल अच्छा है।

चंडीगढ़ के कालेजों ने फीस बढ़ाई

शहर के सरकारी और गैर सरकारी कालेजों ने ५ से १५ फीसदी तक फीस बढ़ा दी है। सभी सरकारी कालेजों को इस संबंध में सर्कुलर भी जारी कर दिए गए हैं। इस संबंध में प्रिंसिपल बैठक करके कल तक यह तय कर देंगे कि फीस कितनी बढ़ेगी। इन कालेजों में दाखिला फार्म १५ जुलाई से मिलने लगेंगे। यह फीस अलग-अलग फंड को बढ़ा कर वसूली जाएगी। जैसे बिजली-पानी फंड ७२० से बढ़ाकर ८५० रुपए करना, मैग्जीन ७५ से ८५ रुपए, मैस सिक्योरिटी १४०० से १६०० रुपए आदि।

क्या चल रहा है जननी सुरक्षा के नाम पर

यहां एक महिला की दवाई न मिलने पर प्रसव के दौरान मौत हो गई। यह सब हुआ एक सिविल अस्पताल में। मातृत्व मृत्यु दर घटाने के लिए करोड़ों रुपए का फंड जारी हो रहा है। इसके बावजूद यह देखने में आता है कि डॉक्ट़र दवाएं किसी एक कंपनी की लिखते हैं। मरीजों की संख्या रोज इतनी हो ही जाती है कि जब पर्ची कैमिस्ट तक पहुंचती है, दवा कई बार खत्म हो चुकी होती है। दूसरी कंपनी की कौन सी दवा इसकी जगह ली जा सकती है, न तो मरीज के रिश्तेदार को पता होता है और कैमिस्ट को यह डर होता है कि किसी ओर कंपनी की दवा दी गई तो डॉक्टर नाराज हो जाएगा। अच्छा-भला धंधा चल रहा है क्यों बिगाड़ा जाए। इस चक्कर में कई बार मरीज की जान भी चली जाती है। इस घटना में भी ऐसा हुआ, यह पक्के तौर पर तो नहीं कहा जा सकता। यह घटना खरड़ के सिविल अस्पताल की है। महिला पिंकी का प्रसवकाल शुरू होने के बाद से इसी अस्पताल से इलाज चल रहा था। शुक्रवार को उसे भर्ती भी करा दिया गया था। शनिवार को अचानक उसकी हालत बिगड़ने पर उसे इमरजेंसी में ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया। उसके एक परिजन को दवाई की लिस्ट पकड़ा दी गई। परिजनों का कहना है कि वह दवाई आसपास कहीं नहीं मिली। जब तक वे दवाई लेकर आए तब तक पिंकी की हालत काफी बिगड़ चुकी थी। उसे पीजीआई रेफर कर दिया गया। पीजीआई में डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इस मामले में किस स्तर पर लापरवाही हुई कोई नहीं कह सकता। परिजनों की ओर से उसे शुरू से ही अस्पताल की देख-रेख में रखा गया, अगर इसके बावजूद ऐसे कैस हो जाते हैं तो जननी सुरक्षा योजना में क्या चल रहा है, कुछ सवाल तो होने चाहिए।

Sunday, July 12, 2009

महंगाई और मॉल कल्चर

खाद्य वस्तुओं के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। संब्जीमंडी जाओ तो भाव सुनकर पांव के नीचे से जमीन निकल जाती है। शुक्रवार को अपनी मंडी में जिस नींबू के भाव १० रुपए पाव थे वही शनिवार को २० रुपए पाव थे। यानी दुगना अंतर पांव के नीचे से जमीन निकलेगी ही। इसी तरह तोरी, घीया और सीताफल यानी पेठा भी दो दिन में २५ रुपए किलो से ४० रुपए किलो पर पहुंच गया। ३० रुपए किलो बिक रहा दशहरी ४० रुपये किलो से कम पर नहीं मिल रहा है। टमाटर १५ रुपए किलो से बढ़ते-बढ़ते ४५ रुपये पर पहुंच गया है। अन्य सब्जियों का हाल भी यही है। दूसरी ओर मॉल में रेट स्थिर बने हैं। वहां खरीदने गए तो प्याज १३ रुपए किलो। नींबू २८ रुपए किलो, मटर ४१ रुपए किलो जो मंडी में ८९ रुपए किलो से कम पर नहीं मिल रही। इसी तरह टमाटर २२ रुपए किलो मिले। ऐसे में वहां आने वाली भीड़ सब्जियां ही ज्यादा खरीद रही है। किसान मंडी में आदमी यह सोचकर आता है कि सब कुछ सस्ता और ताजा मिलेगा। सीजन के फल और सब्जियां मिलते भी रहे हैं, मगर अब अचानक अपनी मंडी में भाव ऐसे बढ़ रहे हैं, मानो कोई लगाम ही नहीं रही। जरूर कुछ गड़बड़ है। ऐसा होना सही नहीं है। मुनाफा उतना ही वसूलना चाहिए. जो सही है। लालच किसान मंडी की साख के लिए खतरा है। बड़ी कंपनियां तो पहले ही किसान पर नजरे गढ़ाए बैठी हैं।

बया बेवफा नहीं होता

अगर आपके शहर में चंडीगढ़ जैसी हरियाली नहीं है तो किसी छुट्टी के दिन थोड़ा जंगल की तरफ निकल जाएं। जंगल में भले बबूल के पेड़ हों या थोड़ी बड़ी झाड़ियां। आजकल एक पक्षी आपको काफी मेहनत करता नजर आएगा। गोरिया जैसा मगर उससे यह छोटा पक्षी कुदरत का एक बड़ा कारीगर माना जाता है। आपको कम ऊंचाई वाले पेड़ों पर नर बया अपना घोंसला बुनते नजर आएंगे। बरसात का मौसम उनके लिए घोंसले बनाने का होता है। एक नर बया एक ही पेड़ पर कई घोंसले बनाता है। मादा इनमें से जिसे पसंद कर लेती है, उसमें रहने को राजी हो जाती है। नर उससे संबंध बनाता है। बाकी खाली खोसलों को भी अन्य मादाएं पसंद कर ही लेती हैं। इस तरह एक ऋतुकाल में नरबया कई मादाओं से संबंध बनाता है। इसकी शक्ल भले ही गौरेया जैसी होती है, मगर यह उनकी तरह एक सीजन के लिए भी पत्नीव्रता नहीं होते। नर गौराया एक सीजन में एक ही मादा से संबंध बनाता है तथा दोनों मिलकर बच्चों को बड़े करते हैं। मादा बया एक सीजन में दो से चार अंडे देती है। गौराया और बया में एक बड़ा फर्क यह भी है कि गौराया जहां शांत मानी जाती है और आसानी से घरों में आती-जाती है, वहीं बया शोर मचाने के लिए जाने जाते हैं। इनमें झगड़े खूब होते हैं। इनके घोंसलों के पास खूब चहचहाट रहती है। बया की एक और खासीयत यह है कि यह पक्षी मनुष्य के बाद एकमात्र कारीगर है जो अपने घोंसले की बुनाई में जुलाहे की तरह ताने और बाने का इस्तेमाल करता है। कुछ लोग यह सवाल उठा सकते हैं कि जिनमें ज्यादा रचनात्मकता होती है, वे अधिक संबंध भी बनाते हैं। संभवतः हर चिड़िया चाहती होगी कि उसका चूजा सबसे योग्य हो।

समलैंगिकता-ग्रहों का गणित

चंडीगढ़ के ज्योतिष के जानकार अमित बेरी समलैंगिता के पीछे ग्रहों का गणित भी देखते हैं, तथा वे इसे पूर्वजों और पिछले जन्म में किए गए लोगों के पाप का नतीजा भी बताते हैं। उनका कहना है कि अगर ज्योतिष के नजरिए से देखें तो समलैंगिकता की विसंगती की जड़ें भी व्यक्ति के प्रारब्ध और कर्म से निकलती हैं। ऐसा माना जाता है कि जिनके पूर्वज या वे खुद पूर्व जन्म में यौन उछृंखल्लता में लिप्त रहे या अपनी सामंती ताकतों का लाभ लेते हुए दास-दासियों और नौकरों से अप्राकृतिक यौनाचार करते रहे या बहुपत्नी रखने वाले हुए तो अगली पीढि़यों में संभवत ऐसे रुझान दिखते हैं। इस तरह इन लोगों के नाते-रिश्तेदार भावनात्मक रूप से, मानसिक रूप से और शारीरिक रूप से पीड़ित होते हुए यह कर्ज उतारते हैं। समलैंगिक जातक तो खुद इससे आनंदित होते हैं जबकि उनके नाते-रिश्तेदार ही इससे दुख भोगते हैं। हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में छपे बेरी के लेख के मुताबिक कुछ ग्रहों की स्थिति भी कुंडली में इस दोष की द्योतक होती है। इसे कुंडली में शुक्र का नकारात्मक प्रभाव, सप्तम, अष्टम, द्वादश और पंचम भाव के स्वामी तथा सूर्य के अलावा बुध, शनि और केतु की स्थिति भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकती है। पंचम भाव की इसमें बड़ी भूमिका इसलिए मानी जाती है, क्योंकि आदत, प्रकृति और रिश्तों का प्रतीक यही भाव है। इसके अलावा अष्टम और द्वादश भाव यह बताता है कि जातक की यौन आदतें कैसी होंगी। वैदिक ज्योतिष में सभी नौ ग्रहों को प्रवृति के हिसाब से तीन लिंगों में बांटकर देखा जाता है। इनमें सूर्य, बृहस्पति और मंगल को पुरुष, चंद्रमा, शुक्र और राहू को स्त्री ग्रह का दर्जा दिया जाता है। इसी तरह बुध, शनि और केतु को तीसरे सेक्स यानी नपुंसक ग्रह कहा जाता है। इसके पीछे तर्क यह है कि बुध को बाल गृह कहा जाता है और बच्चे सेक्स के योग्य नहीं होते, इस तरह शनि बुजुर्ग ग्रह होने के नाते उन्हें सेक्स और प्रजनन के विपरीत माना जाता। केतु को संन्यासी ग्रह का दर्जा है। वह सेक्स करने में सक्षम तो है मगर माना जाता है कि उसकी इसमें कोई रुचि नहीं। इन ग्रहों के बलवान और विपरीत प्रभाव कुंडली में इस तरह देखे गए हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार तीसरे सेक्स लोगों की कुंडली में बुध ग्रह की बड़ी भूमिका देखी जाती हैं। साथ ही उन पर शनि और केतु का भी प्रभाव होता है। इसलिए यह देखा जाता है कि जो लोग विभिन्न कलाओं और विग्यान में निपुण होते हैं और अपने क्षेत्र में अच्छी पकड़ रखते हैं, उनमें ऐसी प्रवृति पायी जाती है, इसके अलावा अकेले शनि से प्रभावित लोग दरिद्र अवस्था में रहते हैं और उनकी नपुंसकता के चलते समाज में दुत्कारे जाते हैं। अगर केतु अधिक प्रभावशाली होता है तो जातक को मानसिक रूप से सामान्य यौन जीवन से अलग कर देता है। अत्याधिक बुरे प्रभाव में जातक को पागल माना जाता है नहीं तो वह साधु या साध्वी बनकर जीवन गुजारता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब व्यक्ति की कुंडली में शुक्र ग्रह कन्या राशि का हो तथा शनि और मंगल सातवें घर में हों तो जातक में समलैंगिकता का रुझान देखने को मिल जाता है। इसके अलवा २७ नक्षत्रों में मृगशिरा, मूल और शतभिषा नक्षत्र को तीसरे सेक्स का प्रतीक माना जाता है।

Saturday, July 11, 2009

इन बादलों को पहचानें

चंडीगढ़ के आकाश में तीन दिन से बादल छाए थे। अजीब बादल छाये रहे पर न गरजे और न बरसे। कहीं एकाध सेक्टर में से थोड़ी-बहुत टिप-टिप की ओर निकल गए। मुहावरा यह तो सुना था कि गरजने वाले बरसते नहीं पर अब तो काली घटाओं की गरजन सुनने को भी लोग तरस रहे हैं। मौसम विभाग के क्षेत्रीय निदेश से बात की तो उन्होंने बताया कि बादल मुख्यतः तीन तरह के होते हैं। पहला प्रकार है सिरस। सिरस का अर्थ है गोलाकार। ये छोटे गोलाकार बादल होते हैं और अक्सर इक्का-दुक्का आकाश में दिखते रहते हैं। हर मौसम में दिख जाते हैं। पर परसने की गुंजाइश में न के बराबर ही होती है। दूसरी तरह के बादल स्ट्रेटस होते हैं। स्ट्रेटस का अर्थ है फैले हुए। ये बादल पूरे आकाश पर छा जाते हैं। मानसून के बादल ऐसे ही होते हैं। ये काफी नीचे होते हैं। चंडीगढ़ में छाए बादल भी देखने में स्ट्रेटस ही लगे पर बरसने के नाम पर कंजूसी कर गए, जबकि पंजाब के अन्य हिस्सों में जहां से वे गुजर रहे थे काफी बरसे। संगरूर में तो कल जमकर १२३ मिमि बरसात हुई। पर जहां तीन दिन डेरा डाले रहे वहां लोग प्यासे ही रह गए। दीपक तले अंधेरा कहावत तो पुरानी हुई, अब कहिए बादलों तले प्यासे। इसी तरह तीसरे प्रकार के बादल क्यूमुलस कहलाते हैं। क्यूमुलस का अर्थ है रुई का ढेर। ये सफेद रूई जैसे बादल खूब गरजते हैं और तूफानी बारिश करते हैं। इनके साथ ओले पड़ने की संभावना भी खूब रहती है। अब इन बादलों के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे। जरा पहचान कर बताओ कि ये कौन से बादल हैं।

ऐसे भी आती है मौत

यह दास्तां है, गौरव और अलिशा की। चंडीगढ़ के सेक्टर १९ का निवासी गौरव हरियाणा के बरवाला से बीडीएस कर रहा था। अलीशा हॉकी की नेशनल खिलाड़ी थी और सेक्टर ४४ की रहने वाली यह लड़की ११वीं में पढ़ती है। दोनों की लाश शुक्रवार को सेक्टर १९ के बाजार में एक बंद कार से मिली। दोनों की दोस्ती हाल ही में हुई बताई जाती है। गौरव सुबह पांच बजे ही घर से सैर के लिए सुखना जाने की बात कहकर कार से निकला था। मोबाइल पर भी कोई जवाब न मिलने पर शाम को परिजन उसे ढूंढने निकले तो सेक्टर १९ में कार में उसकी युवती के साथ लाश मिली। डॉक्टरों का अनुमान है कि मौत दम घुटने से हुई है। काली फिल्म चढ़ी इस कार में दोनों अंदर बंद थे। शायद ऐसी से निकली कार्बनमोनो ऑक्साइड गैस से दम घुट गया हो। दोनों के शव शनिवार को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिए गए।

बच्चा चुराने का अजीब है यह ढंग

चंडीगढ़ की कालोनी नंबर पांच में गुरुवार को एक महिला पहुंची। उसने बलराम के घर पहुंचकर उसकी पत्नी ममता और साली समता को बताया कि वह एक एनजीओ से आई है। ममता ने अठारह दिन पहले ही एक बच्चे को जन्म दिया था। अभी उसका नामकरण भी नहीं हुआ था। उस महिला ने कहा कि हमारा एनजीओ स्वस्थ्य बच्चों को छह हजार रुपए देता है और उसके अलावा उनकी पढ़ाई का खर्च भी उठाता है। इसके बाद उस महिला ने दोनों से कहा कि वह बच्चे को लेकर उसके साथ पीजीआई चलें ताकि बच्चे के स्वास्थ्य का सार्टिफिकेट लिया जा सके। पीजीआई में पहुंचकर महिला ने बच्चा मां से यह कहकर ले लिया कि मैं जांच कराकर अभी आई। इसके बाद वह महिला नहीं लौटी। काफी देर इंतजार के बाद ममता को अपने ठगे जाने का अहसास हुआ। गुरुवार शाम को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी गई। पुलिस ने शुक्रवार को इस बच्चा चुराने वाले गैंग का भांडाफोड़ कर दिया। बच्चे को लुधियाना से बरामद कर लिया गया। उसे ३० हजार रुपए में बेचा गया था। इस पूरे मामले में एक गाइनी की डॉक्टर सहित तीन महिलाओं को गिरफ्तार किया गया है। इस तरह एक निजी अस्पताल में बच्चा चुराने का काम इस स्तर पर चल रहा होगा यह कोई सोच भी नहीं सकता। हिन्दुस्तान चंडीगढ़ की खबर के मुताबिक रोपड़ निवासी रश्मी ही बच्चा लेने कालोनी नंबर पांच गई थी। वहां से वह एक निजी अस्पताल में पहुंची वहां गायनी डॉक्टर रश्मि जैन से मिली। रश्मि की बहन नर्स कविता और नर्स जया को भी इस मामले की जानकारी थी। उन्होंने यह बच्चा ३० हजार रुपए में लुधियाना के एक दंपति को बेच दिया। असल में यह बच्चा इसी नर्सिंग होम में जन्मा था। पुलिस जब पूछताछ करने पहुंची तो उसे शक हुआ। डॉक्टर और नर्स का फोन सर्विलांस पर लगाया गया। कड़ाई से पूछताछ के बाद सारी कहानी साफ हो गई।

बच्चा चुराने का अजीब है यह ढंग

चंडीगढ़ की कालोनी नंबर पांच में गुरुवार को एक महिला पहुंची। उसने बलराम के घर पहुंचकर उसकी पत्नी ममता और साली समता को बताया कि वह एक एनजीओ से आई है। ममता ने अठारह दिन पहले ही एक बच्चे को जन्म दिया था। अभी उसका नामकरण भी नहीं हुआ था। उस महिला ने कहा कि हमारा एनजीओ स्वस्थ्य बच्चों को छह हजार रुपए देता है और उसके अलावा उनकी पढ़ाई का खर्च भी उठाता है। इसके बाद उस महिला ने दोनों से कहा कि वह बच्चे को लेकर उसके साथ पीजीआई चलें ताकि बच्चे के स्वास्थ्य का सार्टिफिकेट लिया जा सके। पीजीआई में पहुंचकर महिला ने बच्चा मां से यह कहकर ले लिया कि मैं जांच कराकर अभी आई। इसके बाद वह महिला नहीं लौटी। काफी देर इंतजार के बाद ममता को अपने ठगे जाने का अहसास हुआ। गुरुवार शाम को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी गई। पुलिस ने शुक्रवार को इस बच्चा चुराने वाले गैंग का भांडाफोड़ कर दिया। बच्चे को लुधियाना से बरामद कर लिया गया। उसे ३० हजार रुपए में बेचा गया था। इस पूरे मामले में एक गाइनी की डॉक्टर सहित तीन महिलाओं को गिरफ्तार किया गया है। इस तरह एक निजी अस्पताल में बच्चा चुराने का काम इस स्तर पर चल रहा होगा यह कोई सोच भी नहीं सकता। हिन्दुस्तान चंडीगढ़ की खबर के मुताबिक रोपड़ निवासी रश्मी ही बच्चा लेने कालोनी नंबर पांच गई थी। वहां से वह एक निजी अस्पताल में पहुंची वहां गायनी डॉक्टर रश्मि जैन से मिली। रश्मि की बहन नर्स कविता और नर्स जया को भी इस मामले की जानकारी थी। उन्होंने यह बच्चा ३० हजार रुपए में लुधियाना के एक दंपति को बेच दिया। असल में यह बच्चा इसी नर्सिंग होम में जन्मा था। पुलिस जब पूछताछ करने पहुंची तो उसे शक हुआ। डॉक्टर और नर्स का फोन सर्विलांस पर लगाया गया। कड़ाई से पूछताछ के बाद सारी कहानी साफ हो गई।

Friday, July 10, 2009

अस्सी हजार से ज्याद बच्चे हुए परेशान

निजी स्कूल बस ऑपरेटरों की हड़ताल के चलते शुक्रवार को चंडीगढ़ में करीब अस्सी हजार छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों को परेशान होना पड़ा। वे खुद बच्चों को छोड़न लगे। इसके चलते सुबह सात बजे से ही शहर की सड़कों पर हजारों कारें, स्कूटर और रिक्शे ही दिख रहे थे और चोराहों पर जगह-जगह जाम लग गए। निजी बस ऑपरेटर छात्रों से फीस के साथ किराया तो पहले ही वसूल लेते हैं, मगर सेवा देने के नाम पर हड़ताल पर निकल जाते हैं। इससे बच्चों की पढ़ाई पर भी असर पड़ता है। इसलिए हड़ताल करने की इजाजत हरगिज नहीं दी जानी चाहिए। विवाद और समस्याएं आपसी बातचीत से सुलझाई जानी चाहिए।

इसे भोगो लालू प्रसाद

-सुधीर राघव
यह लालूपन का एक और खुलासा है। रेलमंत्री ममता बेनर्जी ने संसद में वीरवार को खुलासा किया कि रेलवे के मुनाफे को लेकर लालू प्रसाद यादव सौ करोड़ जनता की आंखों में धूल झोंकते रहे। ८३६१ करोड़ के मुनाफे को २०,००० करोड़ रुपए बताया गया। अगर यही बात निजी क्षेत्र से जुड़ी होती तो सत्यम जैसा शोर मच गया होता। यह मीडिया के लिए भी शर्म की बात है कि उसके रहते लालू पांच साल तक देश की जनता से झूठ बोलते रहे और वह बिना सच्चाई परखे उसके गुनगान करता रहा। इससे पहले वह वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन बनाने के अपनी ही घोषणा को फऱेब कह चुके हैं। इस मानसिकता पर मुझे एक घटना याद आ रही है।किस्सा आठ साल पहले का है। जालंधर रेलवे स्टेशन से मैंने घर जाने के लिए रिक्शा लिया। रिक्शे मे बैठते ही रिक्शा चालक ने अपनी राम कहानी शुरू कर दी। साहब का बताएं, मजबूरी में रिक्शा चलाते हैं। मजबूरी भी क्या यो कहलो बस अपना शोक ही निराला है। मधेपुरा में अपनी काफी जमीन जायदाद है। १२ बीघा में तो पोदीना ही होता है। शादी के बाद पिता जी बोले की राधे अब जमीन-जदाद तुम ही संभालोगे। हम बोले हम से नहीं होता यह सब। कौन जाकर अपकी सौ बीघा जमीन के रोज चक्कर लगाए। बस क्या था, घर छोड़कर इधर आ गए पंजाब में। रिक्शा चला रहे हैं। घर से हर दूसरे दिन तार आ जाता है कि राधे लोट आओ, पर हमने ठान लिया तो ठान लिया। घर पहुंचकर मैं रिक्शे से उतरा उसे १० रुपए दिए और घर के अंदर चला गया। तब उस पर कभी सोचा भी नहीं। पहली ही नजर में मान लिया कि गप्प हांक रहा है। अब लालू के बारे में यह जानकर अचानक उसका चेहरा भी सामने आ गया। लालू प्रसाद और रिक्शा चालक की सोच में मुझे कोई ज्यादा अंतर नहीं दिखता। इसके बावजूद रिक्शाचालक को इसके लिए दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उस पर अपना आत्मसम्मान बचाए रखने के लिए दबाव होगा। एक रिक्शा चालक से वैसे भी लोग बड़े असभ्य तरीके से पेश आते हैं। संभवत है चारा घोटाला के बाद लगातार गरिया जा रहे लालू प्रसाद भी ऐसी ही मनोस्थिति से गुजर रहे होंगे, जब वे रेलमंत्री बने। चूंकी रेलवे में आपके पास ओबलाइज करने के लिए काफी संसाधन होते हैं, अतः मीडिया में कुछ लोग दोस्ती को आतुर भी हो गए होंगे। अब जब आंकड़े निकल कर सामने आ रहे हैं तो पाठक यह सवाल कर सकते हैं कि अब किसका कितना भरोसा किया जाए। आपको लगता है कि वह रिक्शा चालक खुला झूठ बोल रहा था, तो क्या आप उसे किसी जिम्मेदारी वाले पद पर देखना चाहेंगे। आपका जवाब होगा नहीं। लालू के बारे में भी शायद आपका यही जवाब हो। इसके बावजूद लालू सत्ता में अगले किसी भी चुनाव में लोट सकते हैं। क्योंकि लोग वैसे ही प्रतिनिधि चुनते हैं, जिनसे उन्हें सुविधा होती है। इसी तरह भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार फैलता है। झूठ बोलने वाले दंडित हों, यह हर कोई चाहता है। सत्ता से बाहर बैठे लालू हो सकता है कि अपने ऐसे अनेक झूठ का ही दंड भोग रहे हों। लोग इस संबंध में कोई वैग्यानिक तर्क नजर नहीं आता और इसलिए वह कहते हैं, ईश्वर की लाठी बेअवाज होती है। यह लाठी एक-दूसरे के हाथ में घूमकर एक-दूसरे को दंडित करती है। अब ममता बनर्जी जिस तरह से लालू के हर जले पर नमक छिड़क रही हैं, यह लालू के हिस्से का दंड है। इसे भोगो लालू प्रसाद।

Thursday, July 9, 2009

एक ही दिन में रचाई सात समलैंगिक जोड़ों ने शादी

चंडीगढ़ और पंचकूला में बुधवार को एक ही दिन में सात समलैंगिक जोड़ों ने शादी रचाई। इनमें से दो शादियों की पुष्टि तो हरियाणा एड्स कंट्रोल सोसायटी ने भी की है। इनमें एक जोड़ा जरनैल और दीपक का है। दीप ने अपना नाम बदलकर सपना कर लिया है। जरनैल एक दूध की डैयरी में काम करता है। उसका कहना है कि वह सपना से पांच साल पहले एक पार्क में मिला था और उसकी चाल देखकर रीझ गया था। उन दोनों ने एक मंदिर में जाकर शादी की है। हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक सपना का कहना है कि वह जरनैल को पति के रूप में पाकर काफी खुश है। इसी तरह दूसरा जोड़ा सचिन और संजना का है। सचिन का कहना है कि शुरू में दोस्त और परिवार वाले काफी चिढ़ाते थे। लेकिन वह अपने प्यार को पाने में कामयाब रहा। सूत्रों के हवाले से लिखा गया है कि जबसे दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर माना है, तब से चंडीगढ़, पंचकूला और मोहाली में करीब २५ जोड़े विवाह रचा चुके हैं। ऐसे विवाह रचाने वालों में कुछ लड़कियां भी है। ये लोग धर्मस्थलों में ही जाकर गंधर्व विवाह कर रहे हैं। वहां जाकर एकदूसरे को बरमाला पहनाते हैं और फिर दोस्तों के बीच आकर पार्टी करते हैं।

Wednesday, July 8, 2009

पटवारी का वेतन गधे के बराबर

गधे पंजीरी खाएं... की कहावत तो आपने सुनी होगी। इस कहावत पर हरियाणा सरकार अमल भी करती है। हरियाणा सरकार द्वारा वर्ष २००९-१० के लिए जारी कॉन्टीजेंसी फंड के अनुसार गधे की दिहाड़ी २०५ रुपए है। इतना ही दिहाड़ी अनुबंधित पटवारी, कर अधीक्षक, स्वास्थ्य केंद्र निरीक्षक, फार्मासिस्ट और स्नातक कंप्यूटर ऑपरेटर्स के लिए है। २०५ रुपए की दिहाड़ी अकेले गधे के लिए, अगर मालिक साथ हो तो यह ४०० रुपए से भी ज्यादा है। इसके अलावा ऐसे कर्मचारियों की भी सूची लंबी है, जिन्हें दिहाड़ी के लिए गधे से भी कम आंका गया है। इनमें आईटीआई पास कारीगर और सड़क निरीक्षक की दिहाड़ी १८५ रुपए, सुरक्षा गार्ड की १८० रुपए, प्रयोगशाला सहायक, नर्स, आया, बिल वितरक, खलासी आदी की दिहड़ी भी गधे से काफी कम रखी गई है।

(हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के बुधवार के अंक में आप यह खबर विस्तार से पढ़ सकते हैं)

Tuesday, July 7, 2009

बदल गया सावन

-सुधीर राघव
आज से सावन का महीना शुरू हो गया है। सावन का नाम सुनते ही ठंडी, लहराकर चलती तेज पुर्वाई का अहसास होता है और उमड़ते-घुमड़ते काले बादलों की तस्वीर उभरती है, जो कभी गरजते हैं और कभी मूसलाधार बरसते हैं। उनके आगे जेठ-भादों की तपती धूप की गर्मी छूमंतर हो जाती है। बागों में मोर नाचते हैं, कोयल की मधुर गूंज कभी अमराई से आती है तो कभी नीम के उस पेड़ से जिस पर छूले पड़ गए हैं। कवि के मन में भी हिलोरें उठने लगती हैं। नवविवाहिताएं मायके आ जाती हैं। आकाशवाणी दिल्ली से सावन के मधुर ब्रज गीत बजते हैं। सावन की यह तस्वीर लगता है पुरानी हो गई। जैसे-जैसे इन्सान बदला है सावन भी बदल गया है। यहां चंडीगढ़ में सावन का स्वागत चालीस डिग्री तक पहुंचा पारा कर रहा है। आसमान में बादल दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे। मोर और कोयल की बात करनी है तो छतबीड़ चिडियाघर का चक्कर लगा आइए। अब शहर ही नहीं गांवों में भी सावन के मायने इतने ही रह गए हैं। फसलों पर पेस्टीसाइट्स के अंधाधुंध इस्तेमाल ने मोर और कोयल छोड़े ही कहां। कुछ इक्का-दुक्का कहीं दिख जाते हैं। मोर मन का प्रतीक है, उसे कंकरीट के जंगल ऐसा आनंद नहीं दे सकते कि वह मगन हो कर नाचने लगे। उसे तो मानसून का छपछप राग चाहिए। बादलों की उमड़-घुमड़ और जमीन को छूकर चलती पुर्वाई। हम प्रकृति का दोहन कर रहे हैं। बदले में उसे क्या दे रहे हैं। यह कौन सोचे। ज्योतिषी चिल्ला रहे हैं कि इस सावन में तीन ग्रहण है। चंद्रग्रहण के साथ सावन शुरू हो रहा है, बीच में अमावस्या को सूर्यग्रहण और फिर अगली पूर्णिमा को चंद्रग्रहण। यह लक्षण कोई शुभ नहीं है। प्रकृतिक कोप देखने को मिल सकते हैं। ज्योतिषी का गणित मैं नहीं जानता, मगर इतना जरूर जानता हूं कि इस सावन को सचमुच कई ग्रहण लगे हैं। हमने अंधाधुंध पेड़ काटे हैं। मानसून तो भटकेगा ही। हमारे ऐसी, फ्रिज से निकले क्लोरो-फ्लोरो कार्बन ओजोन परत के लिए खतरा हैं। धरती लगातार गर्म हो रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्र तल बढ़ रहा है। अब इतना होगा तो सावन को तीन नहीं कई ग्रहण लगेगें। इसलिए सावन सूखा है। मौसम विभाग की आलोचना की जाती है कि वह मौसम को नहीं पकड़पाता उसकी भविष्यवाणी हमेशा फेल होती है। विभाग क्या करे। मानव निर्मित इतने कारक मौसम को प्रभावित करने लगे हैं कि उनका हिसाब-किताब लगाने के लिए वर्षों की रिसर्च चाहिए। पहले जब इनसान कुदरत के आगे दब कर रहता था, उसकी इज्जत करता था तो उसे कुदरत का अंदाजा भी रहता था। एक सामन्य बुद्धिवाला घाघ भड्डरी भी हमारे सेटेलाइट्स और संसाधन संपन्न मौसम विभाग से कहीं सटीक भविष्यवाणियां करता था। अब इन्सान ज्यादा घाघ है, पर घाघ बनकर फायदा क्या। उसका सावन तो सूखा है।

जब-जब स्कूल खुले

गर्मी की छुट्टियों के बाद आज चंडीगढ़ में बच्चों के स्कूल खुल गए। स्कूल तब खुले हैं जब धूप और तीखी हो गई है और अधिकतम तापमान चालीस डिग्री के आसपास पहुंच चुका है। पहले स्कूल १ जुलाई से खुलने थे मगर मानसून की देरी की वजह से छुट्टियां सात जुलाई तक बढ़ा दी गईं। मंगलवार का दिन स्कूली बच्चों के लिए तब परेशानी वाला रहा, जब उन्हें स्कूल से लौटना था। छोटे बच्चे तो लंबी छुट्टियां बिताकर स्कूल लौटने को आसानी राजी नहीं थे, उन्हें समझाबुझा कर भेजा गया। कोई चालकलेट लेकर माना तो कोई चीटोज। खेर माताओं ने कुछ राहत जरूर ली की अब बच्चों की धमाचौकड़ी से कुछ राहत तो मिलेगी। बिना बात की किचकिच भी कम होगी। नहीं दिनभर उनकी फरमाइशें चलती रहती थीं। इसके बावजूद जब तीखी धूप में बच्चों को स्कूल से आते देखती हैं तो परेशानी होना स्वभाविक है। मौसम विभाग का कहना है कि मानसून के बादल तो फिर भटक कर दूर निकल गए हैं, गर्मी ऐसी ही पड़ी तो १० जुलाई के आसपास ही बरसात की उम्मीद बनती है।

यह कैसा बजट

-सुधीर राघव
लंबे समय बाद दीर्घकालिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बना बजट सामने आया है। इसमें लोकप्रिय फैसले लेने से बचा गया है। यह जरूरी नहीं है कि लोकप्रिय फैसले व्यवस्था के लिए फायदेमंद हों? वित्तमंत्री चाहते तो आयकर सीमा में छूट दो लाख तक कर और उद्योगों के लिए पैकेज की घोषणा कर आसानी से वाहवाही लूट सकते थे। ऐसा नहीं किया गया। बजट में व्यवस्था उन लोगों को लिए की गई, जिन्हें शायद इस बात ठीक-ठीक अंदाजा भी नहीं हो पाएगा कि उनके लिए क्या-क्या किया गया है। यह तो था जनदृष्टि से बजट का आकलन। लोगों के लिए इसमें बहुत खुश होने के लिए कुछ नहीं है। यही बजह भी रही की बजट भाषण सुन शेयर बाजार धड़ाम हुआ।अब जाने की अर्थशास्त्र क्या कहता है। देश के तीव्र विकास के लिए ऊंची विकासदर जरूरी है। जाहिर है देश का सकल उत्पादन जिस गति से बढ़ेगा, उसी गति से रोजगार बढ़ेंगे, लोगों की आया बढ़ेगी, आय बढ़ने से क्रयशक्ति बढ़ेगी, जाहिर मांग बढ़ेगी और निवेश का माहौल बनेगा। अभी तक जो छह से आठ फीसदी की विकासदर के बीच हम पिछले दस साल से चल रहे हैं, वह हमें महानगरों और उनके आसपास के छोटे शहरों और कस्बों में हुए विकास की बदोलत है। यहां ढांचागत व्यवस्था में निवेश हुआ, जमीनों के भाव बढ़े, लोगों को रोजगार मिले और इतनी ज्यादा दोहन हो गया कि यहां और निवेश की सीधी गुंजाइश नहीं थी और ज्यादा निवेश वहां सिर्फ चीजों के दाम बढ़ाने वाल ही हो गया यानी सीधे-सीधे इनफ्लेशन। इसे हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं। दिल्ली और गुड़गांव के आसपास के किसी भी इलाके में आज से दस साल पहले जमीन के रेट देखे। तब जो निवेश हुआ, उसने वहां नए संसाधन खड़े किए और वहां की बेरोजगार पड़ी या कम उत्पादकता दे रही जमीन और लोगों को उपयोगी बना दिया। अब वहां और निवेश का मतलब है कि निवेशक को जमीन खरीदने के लिए बहुत बड़ी प्रतियोगिता का सामना करना होगा और कीमत काफी ऊंची होती जाएगी। इसके अलावा उसके उत्पादन के खरीददार भी कम होंगे क्योंकि वहां उसे प्रतियोगियों का सामना करना पड़ेगा, और इस तरह एक मंदी की स्थिति उसे अपने काम में झेलनी होगी। इसके विपरीत दूर-दराज के इलाकों में अब भी जमीन और लोग अनुपयोगी और बेरोजगार हैं। वहां कोई निवेश करने को राजी नहीं है। वजह, वहां लोगों के पास क्रय शक्ति नहीं है। जिनके पास है, उनकी संख्या इतनी कम है कि उन्हें अपनी खऱीददारी के लिए शहर आना पड़ता है और चीजें उनके पास नहीं पहुंचतीं। इन लोगों की अगर क्रयशक्ति बढ़ती है तो जाहिर है कि निजी निवेशक और उद्यमी वहां भी पहुंचने लगेंगे। शुरू में कोई निवेशक वहां धन नहीं लगा सकता, क्योंकि यह घाटे का सौदा है और धन लगाने के बाद लंबा इंतजार करना होगा। इसलिए यह पहल सरकार को करनी होगी। इस बजट में सरकार ने वही पहल की है। ग्रामीण और मजदूरों और किसानों के लिए बनी योजना कोई समाजवादी फलसफा नहीं है, यह ठेठ पूंजीवादी जरूरत है। अगर पूंजी का प्रसार इन पिछड़े इलाकों की ओर नहीं होता है तो भारत भी लंबी मंदी के भंवर में उसी तरह से फंस सकता है, जैसे पश्चिमी देश, जिनके पास अब विकास के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है। हो सकता है इसके लिए वे अफ्रीकी देशों का रुख करना चाहें, मगर इसके लिए अगर अफ्रीकी देशों के सरकारें उदार होती हैं और इन कंपनियों को धन लगाने की इजाजत देती हैं तो वे इनपर उपकार ही करेंगी। साथ ही भूख और गरीबी से लड़ रहे लोगों की मदद होगी इसलिए यह मानवता से भी उपकार होगा। हमारे देश में एक साथ रवांडा और न्यूयॉर्क बसता है। इसलिए हमें प्रयोग करने के लिए अपने ही देश में काफी गुंजाइश है। इस तरह से प्रणब का बजट अर्थशास्त्र की किताब के मुताबिक बिल्कुल समय के अनुकूल है। इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। अगर किसी अर्थशास्त्री को प्रणव को बजट पर नंबर देने हों तो वह सौ में से नब्बे से ज्यादा ही देगा। यही वजह है कि उद्योगों को कुछ खास न मिलने के बाद भी फिक्की के अध्यक्ष या किसी भी बड़े औद्योगिक संगठन ने बजट की आलोचना नहीं की है। असल में दूरदराज के इलाकों के लिए बिजली, सड़क और मूलभूत सुविधाओं का फंड बढ़ाकर और उनके लिए रोजगार के नरेगा जैसी योजनाओं में अस्सी फीसदी की बढ़ोतरी कर परोक्ष रूप से उद्योगों को ही नई जमीन देने की तैयारी की गई है। अगर योजनाएं सफल हुईं तो उद्योगपति पांच साल बाद उन दूरदराज के इलाकों में उद्योग लगाना पसंद करेंगे, जहां बिजली, पानी और सड़क हो। वहां जमीन और मजदूर तो पहले ही काफी सस्ता होगा। अगर ऐसा होता है विकास दर दो अंकों में आसानी से पहुंच सकती है।
सबसे बड़ी बाधा पर ऐसा होने में सबसे बड़ी बाधा हमारा चरित्र है। सरकारी योजनाओं के बारे में राजीव गांधी खुद कहते रहे हैं कि अगर १ रुपया चलता है तो पांच पैसे भी नहीं पहुंचते। अगर यह पैसा गांव के लोगों तक पहुंच पाता है तो तस्वीर बदलेगी, इसमें शक नहीं। वर्ना लालफीताशाही और भ्रष्टाचार और बढ़ेगा है। एक तरह से विधानपालिका ने अपना काम कर दिया है। अब लोकतंत्र के अन्य स्तंभों को इस दिशा में काम करने की जरूरत है। कार्यपालिका में सबसे ज्यादा गड़बड़ होती है। ऐसे में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया को एक बार फिर अपनी चौकस निगाहें रखनी होंगी। इसके लिए मिडिया को भी अब गांवों और कस्बों का रुख करना होगा। अब अगल दशक का नारा यही है, चलो गांव की ओर।

Monday, July 6, 2009

उम्मीद से कम मिला

चंडीगढ़ को बजट में उम्मीद से आधा ही मिला। शहर के विकास के लिए नियोजित खर्च के रूप में छह सौ करोड़ रुपए मांगे गए थे, मिले हैं सिर्फ ३१९ करोड़ रुपए। इसी तरह पंजाब यूनिवर्सिटी ने पीएमओ को भेजे योजना खर्च में सौ करोड़ रुपए की मांग की थी मगर उसे भी आधी रकम यानी पचास करोड़ रुपए ही मिले। इस तरह जरूरत के मुताबिक पैसा नहीं मिला। इसके बावजूद चंडीगढ़ वालों को यह सोचकर खुश होना चाहिए कि उन्हें कुछ तो मिला। यही सोचकर पीयू में तो लड्डू भी बांट दिए गए हैं। सच है मांगने को कह दो मुंह खुल ही जाता है। जो मिल जाता है, वह कम ही लगता है। यही हाल नौकरी-पेशा का है, उन्हें उम्मीद थी कि आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर दो लाख तक कर दी जाएगी, पर बढ़ाए भी तो बस दस हजार रुपए और कुल मिलाकर बाबूओं के इस शहर को इस बजट से कुछ खास खुशी नहीं हुई।

Sunday, July 5, 2009

पंचकूला में बनेगी २२ मंजिला इमारत

ग्रेटर चंडीगढ़ यानी चंडीगढ़, पंचकूला और मोहाली की ट्राईसिटी में अभी तक गगनचुंबी इमारतों पर रोक है। तीन मंजिल से ऊंची इमारतें यहां नहीं हैं। लेकिन अब पंचकूला में भी दिल्ली और मुंबई जैसी गगनचुंबी इमारतें दिखेंगी। सेक्टर ३ में २२ मंजिला इमारत बनाने की योजना हुडा ने बनाई है। इस हुडा टावर के नाम से ही जाना जाएगा। ५.५ एकड़ में बनने वाली इस इमारत में २० मंजिलें जमीन के ऊपर होंगी और दो बेसमेंट में। पूरी तरह एयर कंडीशंड यह टावर में सौर ऊर्जा बिजली की जरूरतों को पूरा करेगी। इसके अलावा सेक्टर ५ में एक फाइव स्टार होटल की इमारत भी गगनचुंबी होगी। इसके लिए ७५ मीटर ऊंची इमारत बनाने की मंजूरी दे दी गई है।

पंचकूला में बनेगी २२ मंजिला इमारत

ग्रेटर चंडीगढ़ यानी चंडीगढ़, पंचकूला और मोहाली की ट्राईसिटी में अभी तक गगनचुंबी इमारतों पर रोक है। तीन मंजिल से ऊंची इमारतें यहां नहीं हैं। लेकिन अब पंचकूला में भी दिल्ली और मुंबई जैसी गगनचुंबी इमारतें दिखेंगी। सेक्टर ३ में २२ मंजिला इमारत बनाने की योजना हुडा ने बनाई है। इस हुडा टावर के नाम से ही जाना जाएगा। ५.५ एकड़ में बनने वाली इस इमारत में २० मंजिलें जमीन के ऊपर होंगी और दो बेसमेंट में। पूरी तरह एयर कंडीशंड यह टावर में सौर ऊर्जा बिजली की जरूरतों को पूरा करेगी। इसके अलावा सेक्टर ५ में एक फाइव स्टार होटल की इमारत भी गगनचुंबी होगी। इसके लिए ७५ मीटर ऊंची इमारत बनाने की मंजूरी दे दी गई है।

चंडीगढ़ में घऱ खरीद सस्ती होगी

मंदी की चलते घर की खरीदने का सपना देखने वाले भी दूर हो गए। खासकर चंडीगढ़ जैसे शहर में जो एक बार आए वह यहां अपना एक घर चाहता है। यह देश का मोस्ट प्लांड सिटी है। शहर में घर खऱीदने का सपना देखने वालों के लिए यह खुशखबरी है कि चंडीगढ़ प्रशासन स्टांप ड्यूटी करीब १.३ फीसदी कम करने जा रहा है। हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के रविवार के अंक में छवि खबर के मुताबिक स्टांप ड्यूटी ६.३ प्रतिशत से घटाकर पांच फीसदी करने को प्रशासन तैयार होगा। अगले सप्ताह तक इसका नोटीफिकेशन भी जारी कर दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि कुछ साल पहली भी स्टांप ड्यूटी यहां पांच फीसदी ही थी। रियल स्टेट में आए उछाल के बाद कीमतें तेजी से बढ़ने लगी थीं, इसे देखते हुए प्रशासन ने भी अपनी कमाई बढ़ाने के लिए स्टांप ड्यूटी बढ़ा दी थी। अब रियल स्टेट मंदा पड़ा है। ऐसे में प्रशासन भी अपनी ओर से मदद करना चाहता है, शायद। आप अगर चंडीगढ़ में घर खरीदने का मन बना रहे हैं तो आपके लिए समझिये अच्छा मौका आने वाला है।

Saturday, July 4, 2009

घर की रेल

पिछले २० साल से रेल बजट से यही दिखता है कि रेलवे पूरी तरह से मंत्री की बापौती होती है। मंत्री देश का नहीं एक राज्य का, एक जाति का और संभवतः एक परिवार का ही निकलता है, जिसे धोखे से पूरे देश की प्रगति की कमान सौंप दी जाती है। रेल बजट में पहले हर गाड़ी बिहार जाती थी तो अब इसका रुख पश्चिमी बंगाल की ओर है। अगर यही होना है तो क्यों न रोटेशन सिस्टम शुरू कर दिया जाए, मंत्रालय फिक्स कर दिए जाएं कि अमुक बार अमुक राज्य का ही मंत्री बनाया जाएगा। कमसे कम इससे पूरे देश का विकास तो सुनिश्चित हो जाएगा। ममता, पासवान, नीतीश, लालू और फिर ममता। रेल निरंतर एक विशेष हिस्से में ही प्रगति कर रही है। सिर्फ रेल पटरियों पर ही नहीं मंत्री का प्रभाव भर्तियों पर भी खूब पड़ता है। रेलवे में पिछले बीस साल में भर्ती हुए लोगों के आंकड़े निकाल लीजिए, इनकी तुलना पुराने आंकड़ों से करें। आप पाएंगे कि एक राज्य के लोग अचानक बहुत ही विद्वान हो गए हैं और भर्ती में उनका प्रतिशत बढ़ा है। अन्य राज्य फिसड्डी होते चले गए। यह सब तब होता है, जब हम आस्ट्रेलिया पर नस्लवाद और क्षेत्रवाद का आरोप मढ़ते हैं। हमारे मंत्री और नेता सबसे ज्यादा क्षेत्रवादी आपको दिखेंगे और साथ ही दूसरों पर क्षेत्रवाद का आरोप लगाते भी दिखेंगे। असल में जो खुद क्षेत्रवादी होते हैं, वही दूसरों पर सबसे ज्यादा इसके आरोप लगाते हैं। असल में उनकी दृष्टि यहीं तक सीमित होती है। ममता के रेलमंत्री बनने से उम्मीद की जा सकती है कि रेलवे के परीक्षा परिणाम भी बदलेंगे और अब पश्चिमी बंगाल के परीक्षार्थियों का सफलता प्रतिशत बढ़ेगा। बाकी नॉर्थ, साउथ और वेस्ट वालों को अभी इंतजार करना होगा। वह कब योग्य होंगे यह तो वक्त ही बताएगा। पंजाब और हरियाणा वाले तो पहले इसीके चलते कि यहां अपने को कोई नहीं पूछेगा। लोकसभा की कुल मिलाकर १० या १३ सीट, इनके दम पर कोई कैसे रेलमंत्री बनेगा। इसलिए बेचार चुपचाप विदेश निकल जाते थे। अमेरिका हो, कनाडा हो या इंग्लैंड अपनी योग्यता का परचम भी इन्होंने फहराया, पर रेलवे बोर्ड की परीक्षा पास करना अभी इनके बस की बात नहीं है। परीक्षा तो मुंबईवालों से भी पास नहीं होती, वो तो कहते हैं हमें परीक्षा की सूचना ही नहीं दी जाती। नौकरियों के विग्यापन निकलते थे, महाराष्ट्र में नहीं छपते। वे लड़ाई झगड़े पर उतर आते हैं। क्षेत्रवाद फैलाते हैं। साउथ वाले उत्तर और पूर्व वालों से पहले ही ज्यादा उम्मीद नहीं रखते। इसलिए साइंस और तकनीक में अव्वल बने हुए हैं, क्योंकि सिफारिश के दम पर आप अविष्कार नहीं कर सकते। इसके लिए आपको ही खटना पडे़गा। ममता दीदी से हम यही अनुरोध कर सकते हैं, भले ही आपको बंगाल की मुख्यमंत्री बनना है, मगर आप पूरे देश की रेलमंत्री है। यह पहला बजट तो चलो ठीक है। भविष्य में थोड़ा ध्यान रखिएगा। आप पूरे देश की दीदी हैं। पूरा देश आपको मनता है। इसलिए यहां कोई राज्य पराया नहीं है। पंजाब की दिक्कतें समझें, जो रेल परियोजनाएं २० साल पहले बजट में घषित हुईं, वह अब तक पूरी नहीं करवाई गई हैं। उन्हें उनका घोषित फंड ही नहीं मिल पाया और समय बढ़ने के साथ-साथ लागत बढ़ती गई। पंजाब तो एक उदाहरण देश के अन्य हिस्सों का भी ऐसा ही हाल है।

चंडीगढ़ में बसों का किराया बढ़ाने की तैयारी

चंडीगढ़ में लोकल बसों का सफर महंगा हो सकता है। सीटीयू प्रबंधन लगातार बढ़ते घाटे से तंग है। यह घाटा बढ़कर १३ करोड़ रुपए सालाना तक पहुंच चुका है। ऐसे में डीजल का रेट बढ़ने से उसे बहाना भी मिल गया है। प्रबंधन किराये में दोगुनी बढ़ोतरी करने के मूड में है। मौजूदा समय में यह पांच रुपए है जो कि १० रुपए हो सकता है। इसी तरह एसी बसों, जिनका किराया १० रुपए है, वह भी बढ़ेगा। असल में सीटीयू प्रबंधन टायर खरीद में हुए घपले और कंडम होती बसों से त्रस्त है। बसें जल्दी खराब कैसे होती हैं, इसकी भी अपनी कहानी है। मगर प्रबंधन की विफलता का बोझ आखिर लोगों को ही ढोना होगा। हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के शनिवार के अंक में छपी खबर के मुताबिक सीटीयू के ४१४ बसों के बेड़े में ६१ बसों की रिप्लेसमेंट होनी है और ५७ बसें अगले साल अपनी निर्धारित मियाद पूरी कर लेंगी।

Friday, July 3, 2009

आदमी क्या अमीबा बनेगा

-सुधीर राघव
क्या परिवार आधारित व्यवस्था की जड़ें हिलने लगी हैं। समलैंगिकता पर भारत में बहस तीखी होने के साथ ही यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि यह मानव जाति के लिए आतंकवाद से भी बड़ा खतरा है। असल में विकास की धारा में ही पतन के बीज रहते हैं। हर धारा आगे बढ़ती दिखती है, लगता है विकास की संभावना अनंत तक है, मगर असलीयत यह है कि इसका हश्र एक पहिए जैसा ही है, जिसे धुरी के चारों ओर घूमते हुए फिर वहीं पहुंचना है। मानव जाति का समूचा विकास परिवार, समुदाय और कम्यून के माध्यम से हुआ है। निस्संदेह मनुष्य ने जो अविष्कार किए उन्हें अपने समाज के साथ साझा किया। पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही काम को परिस्कृत करने में खप गईं। आज से बीस साल पहले तक यही कहा जाता था कि सुनार का बेटा सुनार और लुहार का बेटा लुहार। लोग पारंपरिक काम करते थे। इस तरह कामधंधा पुश्तैनी होता था और पीढ़ी दर पीढ़ी उसका परिमार्जन करती जाती थी। बड़े-बड़े संयुक्त परिवार होते थे और पीढ़ीयों द्वारा जुटाए अनुभव के सहारे ही जीविका उपार्जन होता था। भारत ही नहीं लगभग पूरी दुनिया में जहां भी सभ्यताएं खानबदोश नहीं थी, औद्योगिक क्रांति से पहले जीवनशैली एक सी ही थी। जीविकोपर्जन के साधन कमोवेश एक जैसे थे। ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के बाद दुनिया की तस्वीर जिस तरह से बदली है, वह आश्चर्यजनक है। पिछली दो सदी में सामाजिक बदलाव जितनी तेजी से हुए हैं, उतने पहले दो हजार साल में नहीं हुए। इस तरक्की गति इतनी तेज थी कि बड़े-बड़े संयुक्त परिवार इससे सामंजस्य बिठा पाते इसकी गुंजाइश नहीं रही। लोग अपने पैतृक गांवों और शहरों से दूर निकलने लगे। आदमी जड़ों से कटने लगा। इसके बिना जीवनसंघर्ष में पिछड़ना पड़ता। संयुक्त परिवार इस तरह टूटते गए और अब विरले ही दिखते हैं। संयुक्त परिवारों के टूटने के बाद अब एकल परिवार विकास की गति के मार्ग में बोझ बनने लगे हैं। परिवार नामक संस्था अब दुनिया घूमने को मजबूर या उत्साहित लोगों को सुहा नहीं रही है। इसलिए जहां गए वहां लिवइन रिलेशनशिप में रहे और जिम्मेवारियों का बोझ ढोने का वक्त न होने से समलैंगिकता का रुझान भी बढ़ा। अभी जो रुझान है वह भविष्य की व्यवस्था भी हो सकता है। जाहिर है, जब परिवार नामक संस्था भी नष्ट हो जाएगी तो विकास के नाम पर हमारे पास क्या होगा, यह सोचना पड़ेगा। हो सकता है हमारे आकलन, हमारी गणनाएं सब धरे रह जाएं। मानव जाति के विकास के गुण अगर उसकी प्रकृति में छिपे हैं तो उसके पतन के संकेत भी उसकी प्रवृति में होगें। हो सकता है प्रकृति ने हमारे जीन कुछ इस तरह से प्रोग्राम किए हों। एक के बाद एक दुनिया के देश जिस तरह से समलैंगिकों की मांगों के आगे घुटने टेक रहे हैं, उससे लगता है कि मानवजाति के जीन अब उसके खिलाफ ही प्रवृति को बढ़ा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह प्रवृति नई है। प्राचीन ग्रंथों तक में ऐसे संबंधों का जिक्र कुकर्मों की तरह किया गया है, मगर अब जिस तेजी से इनकी संख्या बढ़ रही है, वह संकेत कुछ अच्छे नहीं हैं। क्या इसकी वजह प्राकृतिक संतुलन से छेड़छाड़ है। जिस तरह से पिछले दो सौ सालों में मानव आबादी बढ़ी है और अन्य जीव कम हुए हैं, उसने कुछ असर तो जरूर डाला होगा। समाज में नए तरह के तनाव पैदा हुए। ऐसे तनाव ही शायद उन प्रवृतियों का कारक बन रहे हैं, जिसमें कोई जीव अपने ही वंश की वृद्धि के खिलाफ काम करे। अपने वंश की वृद्धि हर जीव की प्राकृतिक जिग्यासा और कर्म होती है, जिसे कर वह आनंदित महसूस करता है। इसके विपरीत कर्म जाहिर है, हमारे जीन में किसी आत्मघाती लक्षणों के विकसित होने का संकेत हैं। चार्ल्स डार्विन का क्रमविकास बताता है कि बंदर से किस तरह मनुष्य बना, तो क्या यह लक्षण इस बात के संकेत हैं कि मनुष्य फिर किस तरह बंदर बनेगा। और बंदर भी नहीं एक कौशकीय अमीबा या हाइड्रा शायद। ये प्रजनन के लिए नर या मादा पर निर्भर नहीं होते। ये खुद ही विखंडित होते हैं।

Thursday, July 2, 2009

अब शक करने के नए बहाने मिल जाएंगे

कुछ साल पहले तक (हो सकता है, अभी कई जगह हो) यह चलन था कि परिवार वाले लोग छड़े लड़कों को किराए पर मकान नहीं देते थे। उन्हें यह भय रहता था कि वे घर की बहू-बेटियों पर बुरी नजर रख सकता है। कहीं रास्ते में कोई लड़का-लड़की बात कर लेते तो लड़की के चरित्र पर अंगुली उठने लगती। पुरुष मित्र रखने वाली लड़की को बड़े बुजुर्ग तो छोडि़ये संगी-साथी भी अच्छा नहीं समझते थे। हो सकता है इसके पीछे उनकी ईर्ष्या रहती हो। अब शक के दायरे में लड़कों की दोस्ती भी आ सकती है। आखिर शक करने वालों की जुबान कौन पकड़ सकता है।
कुछ ऐसे दृश्य देखने को मिल सकते हैं, दोस्त को खेलने के लिए बुलाने आए लड़कों को दोस्त के बाप ने भगा दिया। मां-बाप ने लड़की के सहेलियों से मिलने पर पाबंदी लगा दी।
अप्राकृतिक संबंधों को मान्यता देकर क्या साबित होगा यह तो समझ से परे है, मगर समाज विसंगतियां हमेशा रहती हैं। विसंगतियां बढ़ें नहीं, इसका ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए। वैज्ञानिकों ने यह भी दर्शाया है की समलैंगिकता केवल मनुष्यों में ही नहीं बल्कि बहुत सी पशु प्रजातियों में भी पाई जाती है। बहुत से पशुओं जैसे पेंग्विन, चिंपाज़ी, और डॉल्फिनों में भी समलैंगिकता पाई गई है, कुछ में तो मनुष्यों के समान ही जीवन भर के लिए भी। प्राचीन संस्कृतियों में समलैंगिकता के संबंध में सर्वाधिक प्रमाण उन चित्रकारियों से प्राप्त होते है, जिसमें दो पुरुषों को अंतरंग संबंध या यौन-क्रिया में दिखाया गया है। १९७९ के बाद से ईरान में लगभग ४,००० समलैंगिकों को उनकी लैंगिक प्रार्थमिकता के आधार पर फाँसी दी जा चुकी है। २००५ में, चौदह महीनों की कैद और प्रताड़ना के बाद किशोरायु के दो लड़कों को फाँसी दे दी गई।
संयुक्त राजशाही में समलैंगिकता अपराध हुआ करता था। ऑस्कर वाइल्ड नाम के प्रसिद्ध आयरिश लेखक को इसके कारण बंदी बनाया गया, और परिणामस्वरूप, इस कारण एक हास्य लेखक और नाटककार के रूप में उनकी प्रतिष्ठा और वृत्ति को बहुत बड़ा झटका लगा। एलेन ट्यूरिंग नाम के व्यक्ति को, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनो द्वारा प्रयुक्त किए गए एनिग्मा कोड को तोड़ कर मित्र राष्ट्रों की सहायता की थी, पर इस अपराध का दोषी ठहराया गया और अंततः उसकी समलैंगिकता के उपचार के प्रभाव के कारण उसने आत्महत्या कर ली।

मारपीट के साथ मना पीजीआई में डॉक्टर्स डे

बुधवार को डॉक्टर्स डे था और पीजीआई में डॉक्टर और मरीज बच्चे के तीमारदार के बीच हाथापाई हुई। हाथापाई ऐसी कि तीमारदार का चेहरा खून से निकलने लगा। हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में छपी खबर के अनुसार पीजीआईके पेडियाट्रिक इमरजेंसी में मंगलवार रात एक साल के बच्चे को भर्ती किया गया। बच्चे को सांस लेने में दिक्कत थी और तेज बुखार था। बच्चे को रात ११ बजे भर्ती किया गया था। सुबह पांच बजे तक किसी डॉक्टर ने उसे अटेंड नहीं किया। बच्चे को इलाज मिलता न देख उसके दादा राम गोपाल मेहता बोखला गए। वह वहां से बच्चे को उठाकर ले जाने लगे तो इलाज करने वाले जूनियर डॉक्टर विनोद ने उन्हें रोका। पहले बहस हुई फिर हाथापाई। राम गोपाल मेहता का चेहरे से खून बहने लगा। सिक्योरिटी गॉर्डस ने आकर दोनों को अलग किया। डॉक्टर के बयान पर धारा १०७ के तहत बच्चे के दादा राम गोपाल मेहता को गिरफ्तार कर लिया गया।

जनरल साहब, जनता की चिंता भी कर लिया करो

जनरल साहब को आजकल एक ही चिंता खाए जा रही है। बेचारे इसी चिंता में दुबले होते जा रहे हैं की केंद्र सरकार के अफसर उनकी सुनते नहीं। वैसे चंडीगढ के बाशिंदों का भी कहना है की अफसर उनकी समस्याएं नहीं सुनते। परंतु इसकी चिंता जनरल साहब को नहीं है। चंडीगढ में कई दिनों तक लोग बिजली के लिए तरसे, प्यासे रहे पर जनरल साहब के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। वैसे भी जनता को सुनने का रिवाज हमारे देश में नहीं है। साहब ने भी इसी परंपरा का अनुसरण किया। स्वहित सर्वोपरि के सिद़धांत का पालन करते हुए जनरल साहब ने अब केंद्र सरकार में अपनी सुनवाई नहीं होने पर दो मिनिस्टरों को पत्र लिख अपना दुखडा रोया है। उन्हें पावर चाहिए। प्रिंसिपलों की नियुक्ति का अधिकार चाहिए। साहब कह रहे हैं की वो पॉवरलेस हैं। हालांकी लोग उन पर अपनी पॉवर का बेजा इस्तेमाल करने का भी आरोप लगाते रहे हैं। उनके कई फैसलों की सीवीसी जांच हो रही है। वैसे जनरल साहब से यह पूछा जाना चाहिए की वे तब क्यों चिंतित नहीं हुए जब नारी निकेतन में एक मंदबुद़धि लडकी के साथ बलात्कार हुआ। बढ रहे अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए आपने क्यों केंद्र को पत्र नहीं लिखे। शहर की सुरक्षा के लिए पुलिस फोर्स में अधिकारियों और जवानों की संख्या बढाने के प्रस्ताव को जब केंद्र ने लगभग खारिज कर दिया तब भी साहब को पत्र लिखने की सुध नहीं आई। अब अपनी पॉवर बढाने के लिए पत्र लिख कर जता रहे हैं की जैसे शहर की इन्हें बहुत चिंता है। जनरल साहब कभी कभी समय निकाल कर जनता की चिंता भी कर लिया करो।
(http://bakbak-bishnoi।blogspot.com/ से साभार)

Wednesday, July 1, 2009

चंडीगढ़ में काबू हाइवे रॉबर्स गैंग

चंडीगढ़, पंचकूला, मोहाली सहित हरियाणा और पंजाब में आतंक का पर्याय बने हाइवे रॉबर्स गैंग को चार और साथियों को चंडीगढ़ पुलिस ने दबोच लिया है। इनमें सरगना जयपाल भी है, जो पंजाब पुलिस के इंस्पेक्टर का बेटा बताया जाता है। उसके अलावा पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाला हरिंदर उर्फ टीनू भी है। टीनू चंडीगढ़ पुलिस के एक इंस्पेक्टर का बेटा है। इससे करीब महीने भर पहले कुरुक्षेत्र की पुलिस ने इस गिरोह के प्रमुख बदमाश राजीव उर्फ राजा और उसकी महिला मित्र सहित चार लोगों को पकड़ा था। हाइवे से अपहरणकर लोगों को घर लाकर लूटने के उनके तरीके ने जीटी रोड पर चलने वालों में दहशत पैदा कर ऱखी थी। ये लोग बड़ी गाडि़यों को निशाना बना रहे थे। हरियाणा पुलिस ने पहले यह आरोप लगाया था कि गिरोह के अन्य साथियों की धरपकड़ में इसलिए दिक्कत आ रही है क्योंकि पंजाब पुलिस और चंडीगढ़ पुलिस के कुछ लोगों के तार आरोपियों से जुड़े हैं। इस तरह चंडीगढ़ पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर कुछ दाग साफ किया है।