Tuesday, June 30, 2009
सोने के सिक्के देने वाली मशीन
सोने के सिक्के देने वाली मुर्गी भले ही हमें आज तक न मिली हो पर अब सोने के सिक्के देने वाली मशीन जरूर जर्मनी में लग चुकी है. नाम है इसका गोल्ड टू गो. फ्रेंकफर्ट एअरपोर्ट पर ये मशीन लग चुकी है. यह एटीऍम मशीन की तरह काम करती है. बस कार्ड डालिए और निकाल लीजिये एक, दस और ढाई सो ग्राम के सिक्के. वो भी बाजार से बीस फीसदी कम कीमत पर. और तो और ये सिक्के आपको गिफ्ट पैक में मिलेंगे. गोल्ड टू गो मशीन लगाने वाली कंपनी की योजना इस मशीन को स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, दुबई और आबुधाबी में लगाने की है. अब दुआ कीजिये की कम्पनी इसे भारत में भी लगा दे.
(पोपुलर साइंस से साभार)
इस बार
शादी के लिए दबाव नहीं डालेगा
और न ही इतना इंतजार करेगा
क्योंकि इसबार
वह दशानन के नहीं इन्सान के मुखौटे में है।।
-सुधीर राघव
(सुधीर राघव की अन्य कविताएं आप http://sudhirraghav.blogspot.com/ पर देख सकते हैं)
वर्षा का आनंद


करीब तीन सप्ताह के लंबे इंतजार के बाद चंडीगढ़ में सोमवार की रात बारिश हुई। मानसून का यह संगीत सुनने के लिए लोगों के कान तरस रहे थे। बादल बरसे और ठीक-ठाक बरसे। मंगलवार की सुबह भी रिमझिम रही मगर दोपहर को धूप निकल आई तो दो बजे के बाद फिर काली घटाएं छा गईं। रात में बारिश की फुहारों का लोगों ने खूब आनंद लिया, वे घरों से बाहर निकल आए। खासकर बच्चों ने रात १२ बजे तक नाहते हुए खूब मस्ती की। इसके फोटोग्राफ हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के सोमवार के अंक में भी देखे जा सकते हैं।
Monday, June 29, 2009
वर्षा
रिमझिम रिमझिम आती वर्षा
जीवन का राग सुनाती वर्षा
धूप तपी सूखी फसलों में,
फिर से जीवन लाती वर्षा।
गर्म रेत जब जलने लगता
तन से पानी चलने लगता
मांझी नाव किनारे रखता.
ऐसे में चुपके से आकर,
मेरी कागज की किश्ती को
बिन पतवार चलाती वर्षा।
गर्मी सताए नर-वानर को
और छोड़ वह अपने घर को
ताकने लगता जब अंबर को
ऐसे में चुपके से आकर
धूप तपे काले बदनों को
ठंडी राहत लाती वर्षा।
लगे कूकने कोयल वन में
मोर नाचने लगे उपवन में
उठने लगें हिलोरें मन में
ऐसे ही चुपके से आकर
रेतीले रेगिस्तानों में
नखलिस्तान बनाती वर्षा।।
-सुधीर राघव
(सुधीर राघव की अन्य कविताएं आप http://sudhirraghav.blogspot.com/ पर देख सकते हैं)
चंडीगढ़ में 40000 गे
कौन बनता है गे - इस संबंध में चिकित्सकों का कहना है कि जिन पुरुषों में पुरुष हार्मोन टेस्टेस्टेरोन कम होता है और जिन स्त्रियों में स्त्री हार्मोन की कमी होती है, उनमें समलैंगिकता का रुझान पाया जाता है। इसलिए इनका रुझान सीधे रूप में साथी से हार्मोन ग्रहण करने का रहता है। इसलिए इन लोगों में मुखमैथुन जैसी विसंगतियां भी पायी जाती हैं। यह सब उनमें कुदरती रूप से होता है।
कानून से अच्छी होगी चिकित्सीय मदद
हमारे समाज का ढांचा ऐसा है कि बच्चे इस तरह की इच्छाएं परिवार के सामने नहीं रख पाते हैं। इन लोगों को अगर किशोर अवस्था में चिकित्सीय मदद मिल जाए तो ऐसे रुझानों को पनपने से रोका जा सकता है। कानून में समलैंगिकों को राहत देने से अच्छा है कि इस ओर ध्यान दिया जाए। अप्राकृतिक कृत्यों को मान्यता देना सही नहीं है।
गे की गंदगी
(http://bakbak-bishnoi।blogspot.com/ से साभार)
राहत की उम्मीद बंधी
Sunday, June 28, 2009
ये हमारा काम नहीं
(http://bakbak-bishnoi।blogspot.com/ से साभार)
अब चंडीगढ़ में भी बिजली के लिए हाय-तौबा
हालांकि मैसम विभाग की ओर से सूचना है कि सोमवार या मंगलवार तक बरसात हो सकती है।।
(यह खबर विस्तार से आप हिन्दुस्तान के आज के अंक में पढ़ सकते हैं)
गागर में सागर का स्वाद
काव्यांजलि चंडीगढ़ साहित्य अकादमी का एक अनूठा प्रयास है। एक ही संकलन में चंडीगढ़ और आसपास के ८९ कवियों को रखा गया है। इस तरह एक बेहद जटिल काम संपन्न किया गया है। इसके बावजूद संकलन संग्रहणीय है,.क्योंकि यह क्षेत्र की प्रतिभा संपदा से परिचय करवाता है। इसमें कुछ स्थापित साहित्यकार हैं तो साहित्य की पगडंडियों के नए पथिक भी। काव्यांजलि के कवि के लिए अगर आप कोई एक चेहरा तलाशें तो नहीं ढूंढ पाएंगे। इसलिए समीक्षाकर्म भी कठिन है। एक ही जगह इतनी विभिन्नता जुटा लेने के लिए डॉ. धर्मस्वरूप गुप्त और उनका संपादक मंडल बधाई का पात्र है। संकलन में कई ऐसे नाम हैं, जो आकर्षण जगाते हैं, कुछ नए बिम्ब भी हैं, जो ताजगी का एहसास करता हैं। सुनील प्रभाकर की कविता -मैं कहां हूं- में इसकी बानगी देखिए-
आज़ादी के दरख्त पर
एक भी हरी पत्ती नहीं
जिससे गरीब आदमी की
मरी उम्मीदों को ढंका जा सके
उर्मिल सखि की कविता में भी ऐसे ही बिम्ब नजर आते हैं। इसके
इलावा जयश्री की कविता में छायावाद, बलवीर संधु में प्रगतिवाद और योजना रावत में आप नई कविता तलाश सकते हैं। इस तरह इस संकलन की कविताएं एक समयकाल की होकर भी अलग-अलग प्रथाओं का अनुसरण करती हैं। कुल मिलाकर इस काव्य संकलन में आपको काव्य की अनेक धाराएं एक साथ बहती दिखाई देंगी। जब बहुत सी धाराएं एक ही जगह गिरती हैं तो सागर बनता है। संभव है सभी धाराओं का स्वाद मीठा हो मगर सागर का स्वाद इससे इतर होता है। उसका अपना स्वाद होता है। यही अलग स्वाद आपको इस संकलन में भी मिलेगा।
(यह समक्षा आप हिन्दुस्तान के २८ जून २००९ के अंक में कलम पृष्ठ पर भी पढ़ सकते हैं)
Saturday, June 27, 2009
स्कूलों की छुट्टियां बढ़ीं
Friday, June 26, 2009
कहानी-किस्सा की कविताएं
हुनर
पहले आदमी बाजार में आया
अपना हुनर बेचने।
फिर औरत भी बाजार पहुंची
खुद को बेचने।
...यह भी आदमी का ही हुनर था।।
खेत
शहर की ओर जाती सड़क से खेत की मिट्टी ने पूछा,
दस साल पहले तू मेरे किसान को ले गई थी,
वह लौटकर नहीं आया।
अगले दिन सड़क किसान को शहर से ले आई।
उसके अगले दिन किसान खेत बेचकर फिर शहर चला गया।।
पेट
किसान के पेट ने कहा-मैं भूखा हूं,
कल से कुछ नहीं खाया।
किसान सोचने लगा-
भगवान गरीब को ऐसा पेट क्यों देता है
जो न गांव में भरता है और न शहर में।।
-सुधीर राघव
पीजीआई में पीलीया
(यह खबर हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के शुक्रवार के अंक में विस्तार से देखी जा सकती है)
Thursday, June 25, 2009
सीना ताने पहाड़ ने
आदमी से कहा
देखो मेरी महानता
देखो मेरी शान
तुम क्या जानते हो?
आदमी ने कहा-
मैं चलना जानता हूं।
...और पहाड़ आदमी के पांव के नीचे था।
२. अकड़ का जन्म
आदमी ने हिमालय से पूछा-
तुम पत्थर कैसे हुए
तुम में इतनी अकड़ कहां से आई?
हिमालय ने कहा-
दबाव से
मेरा जन्म धरती के दो खंडो के
टकराने से उत्पन्न दबाव से हुआ है
वरना तो मैं पहले कोमल मिट्टी था।
३। मोक्ष
अपने ही बोझ से मिट्टी होते पहाड़ से
ऊपर उग आए फूल-पौधे ने कहा-
तुम्हारी अकड़ गई पहाड़
तुम अब मिट्टी हो रहे हो।
पहाड़ ने कहा-
जब अकड़ थी
तब अकेला था
अब जीवन किलकारी भरता है
यह मौत नहीं मोक्ष है।
-सुधीर राघव
अभी मत रोपो धान
नुकसान से कैसे बचें किसान
धान की रोपाई का यह सीजन है। किसान चिंता में है कि वह क्या करे। पनीरी तैयार है। खेत में पानी के लिए ट्यूवैल का सहारा है। कुछ जोशिले किसान ट्यूवैल चलाकर खेत रोप भी रही हैं। पर वे ज्यादा जोख म उठा रहे हैं। किसानों को चािहए कि वे धान की रोपाई से पहले बारिश का इंतजार कर लें। संभव है देर से रोपाई के चलते धान का उत्पादन कुछ कम हो मगर इससे वे और बड़े नुकसान से बच सकते हैं। ट्यूबवैल से सिंचाई करने पर िबजली और डीजल का खर्च अलग से पड़ेगा और जुताई-बुवाई के बाद भी अगर फसल बिना पानी के सूख जाती है तो नुकसान काफी उठाना पड़ेगा।
Wednesday, June 24, 2009
चंडीगढ़ में बढ़ती गर्मी
(इस संबंध में आप विस्तार से चंडीगढ़ हिन्दुस्तान के मंगलवार के अंक में पढ़ सकते हैं।)
Tuesday, June 23, 2009
अल्लाह का बंदा और दिल हिन्दुस्तानी


Sunday, June 21, 2009
कला बाजार ः देह की दुनिया की पड़ताल
पुस्तक समीक्षा
अभिग्यात का उपन्यास कला बाजार कला, साहित्य, मॉडलिंग और पत्रकारिता के अंदर की दुनिया की पड़ताल है। इसकी पृष्ठभूमि भी खासा विस्तृत है, जो पूर्व में कोलकाता से लेकर पश्चिम में अमृतसर तक फैली है। एक-एक कर कड़ियां जुड़ती हैं और कथ्य रोचक बन पड़ा है।
सामाजिक सरोकारों तथा नैतिक मूल्यों में पिछले एक-डेढ़ दशक में जो बदलाव आए हैं उन्हें लेकर अब बहस भी अब बासी और फीकी लगने लगी है। लेखक ने इसी बहस की उपेक्षा की है और अपनी बात बेबाकी से रखी है। उसका यही अंदाज इस उपन्यास को समय के साथ लाकर खड़ा कर देता है। वैसे विवाहेतर और समलेंगिक संबंधों पर जो कुछ लिखा जाता रहा है, उसमें संस्कार में लिपटे होने का भ्रम वह झिझक पैदा करता है कि अक्सर लेखक समाज से दो कदम पीछे ही रह जाता है। अभिग्यात उन्हीं वर्जनाओं को लांघ गए हैं, इसलिए आत्मकथ्य शैली में लिखा गया यह उपन्यास काल्पनिक होते हुए भी आत्मकथा लगता है।
उपन्यास के स्त्री पात्र अपने देहतर वजूद के लिए दौड़ते हैं मगर पुरुष समाज का दृष्टिकोण देह शक्ति के उनके भ्रम को टूटने नहीं देता। मोरा उसकी मां रत्ना हो या रीता ये सभी देह के चक्रव्यू में नैतिक मूल्यों को पराजित करती हैं और खुद भी उसी देह से परास्त होती हैं।
कला बाजार में यही है देह की शक्ति, यह ब्लैकहोल की तरह सबकुछ निगल लेती है। इसमें जो डूबते हैं वे पछताते हैं और बिना डूबे कोई रह नहीं पाता। इस तरह उपन्यास का दर्शन, उसकी रोचकता और विस्तार उसे पठनीय बना देता है।
संभवतः लेखक के विचारों से सहमत हो पाना सहज न हो मगर ऐसे विचार आपके चारों ओर घूमते हैं, बिना आपकी सहमति के इंतजार के।
(यह समीक्षा आप हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के रविवार के अंक में भी पढ़ सकते हैं।)
Saturday, June 20, 2009
गलतफहमी
-सुधीर राघव
कविता सिर्फ कल्पना नहीं होती
कविता कोरा सच भी नहीं होती
कविता नाजुक मन का धर्म है
यह मान लेना भी एक भ्रम है
कविता कल-कल करती नदी है
या ऊंघती-जागती कोई सदी है
कविता सुरों पर साधे राग हैं
या रसबेरियों के लदे बाग हैं
कविता कोई दबी सी आग है
या आकाश का टूटा भाग है
कविता जल का तीव्र आवेग है
या पवन का झूमता सा वेग है
कविता सिर्फ जमीं नहीं होती
कविता सिर्फ जल नहीं होती
कविता सिर्फ वायु नहीं होती
कविता सिर्फ आकाश नहीं होती
कविता सिर्फ अग्नि नहीं होती
कविता कवि की गलतफहमी भी होती है।
नफरत की राजनीति की माया
स्वर्गीय कांशीराम अपने गृह राज्य पंजाब में कोई बहुत प्रभावशाली संगठन खड़ा नहीं कर पाए। वहां, जब-जब बसपा मतबूत हुई, वह तब-तब ही टूटी। दूसरी और यूपी में मायावती के साथ मिलकर वह भी हिट हो गए। आडवाणी भी यूपी में ही हिट हुए। मोदी और वरुण को भी यहां खूब सम्मान मिला। नफरत की राजनीति में रुचि दिखाने का खामियाजा ही उत्तर प्रदेश ने भुगता है और हर मोचर्चे पर यह प्रदेश लगातार पिछड़ता रहा। अब उसे ऐसे ही नेता मिल रहे हैं। मुलायाम हो, मायावती हो या कल्याण सिंह, सबकी बोली और शैली कमोवेश एक जैसी ही है।
पर अब लगता है कुछ सुधार आ रहा है। भले ही माया और मुलायम न सुधरें, पर पिछला लोकसभा चुनाव गवाह है कि लोग सुधर रहे हैं।
Friday, June 19, 2009
अजन्मे बच्चे का भी हो सकता है डीएनए टेस्ट
विशेषग्यों का कहना है कि गर्भ में मौजूद एमियोटिक फ्लयूड से सैंपल लेकर डीएनए जांच की जा सकती है और बच्चे के पिता का निर्धारण हो सकता है। मगर इस काम में सावधानी बरतने की जरूरत हैं।
Wednesday, June 17, 2009
ओबामा का नेहरू मॉडल
साम्यवाद की अवधारणा की साख टूटे अभी दो दशक गुजरे हैं, पूंजीवाद का डंका बजा रहे बाजार की जड़ें इस मंदी में बुरी तरह से हिल गई हैं। मुक्त बाजार के समर्थक अब नकेल की बात कर रहे हैं। अमेरिका भी अब अर्थतंत्र का नेहरू मॉडल अपनाने जा रहा है, जिसे लालफीताशाही कहकर बाहर ही नहीं अपने देश में भी गरिया जाता रहा है। बराक ओबामा ने बड़े वित्तीय सुधारों की घोषणा की है। इसके तहत बैंकिंग प्रणाली पर निगरानी और नियंत्रण के लिए अलग से विभाग भी बनेंगे।
असल में नेहरू अपने समय की दो सबसे लोकप्रिय धाराओं साम्यवाद और पूंजीवाद से अलग अवधारणा पर चले। वह मानते थे कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं है, इसलिए वह ऐसे काम निजी क्षेत्र के हाथों में ही रखना चाहते थे, पर इस सोच के बावजूद वह पूंजीवादी नहीं हो पाए, उनका मानना था कि गरीब भारत में पिछड़े क्षेत्रों में संसाधन खड़े करने का जोखिम कोई उद्योगपति नहीं लेगा अतः इन क्षेत्रों में सरकार को पहल करनी होगी, तथा व्यापक जन प्रभाव वाले क्षेत्र भी सरकार की देखरेख में होने चाहिए। संभवतः नेहरू ने उस समय की दोनों विश्वशक्तियों के बीच सामंजस्य बैठाते हुए एक मजबूत राष्ट्र तैयार करने के लिए यह मॉडल अपनाया हो मगर इस मंदी ने मुक्त बाजार के समर्थकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वित्तीय सेक्टर को खुले सांड की तरह नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि यह सिर्फ उत्पादन ही नहीं बढ़ाता बल्कि विनाश भी कर सकता है। इस क्षेत्र की गलतियां सबको भुगतनी पड़ती हैं। उनके असर से कोई नहीं बच सकता। इसलिए जरूरी है कि इस सांड को खूंटे का बैल बनाया जाए।
हालांकि कार्ल मार्क्स वर्ग संघर्ष के वजह से पूंजीवाद का अंत मानते हैं, मगर मौजूदा परिस्थितियों को देखकर लगता है कि नेहरू मॉर्क्स से ज्यादा दूरदृष्टा साबित हुए। न तो पूंजी का महत्व कम होने वाला है और न ही समाज का। असली रास्ता इन दोनों के बीच से होकर जाता है। इनके बीच का संतुलन ही सबसे बड़ा सिद्धांत है। इसलिए मार्क्स और कैंजे दोनों से कम गुणाभाग करने के बावजूद नेहरू अधिक व्यवहारिक आर्थिक अवधारणा अपने पीछे छोड़ गए हैं।
Tuesday, June 16, 2009
थकने की तुम्हारी जिद्द धोनी
सुधीर राघव
टी-२० की बादशाहत इतनी बुरी तरह से छिनेगी, किसी ने सोचा भी नहीं था। हार के कारणों का ठीकरा फोड़ने के लिए हमेशा बलि के बकरे तलाशे जाते हैं। कुछ दिग्गज कंपनियां और मीडिया के हिस्से यह कभी नहीं चाहेंगे कि उनके वे सितारे जिन पर अरबो रुपए का दांव लगा है, उनके खेल और कौशल पर कोई अंगुली उठे। इसलिए दूसरी हार के बाद तत्काल समीक्षा आ गई कि आईपीएल खेलकर थक गए थे धोनी और उनके धुरंधर। वही आईपीएल जिसे खेलकर क्रिस गेल जैसे दर्जनों खिलाड़ी और चमक तथा निखर गए, हमारे धुरंधर थक गए। हो सकता है कि उन्होंने थकने की जिद ठानी हो, तभी तो पद्म सम्मान लेने के लिए न्यौते गए इन खिलाडि.यों ने दिल्ली में पहुंचकर भी राष्ट्रीय सम्मान से किनारा किया और विग्यापन की शूटिंग में लगे रहे। मामला उठा भी और दब भी गया। जिन्हें राष्ट्रीय सम्मान की चिंता न हो, उनसे यह उम्मीद करना कि जब वे देश के लिए खेल रहे हों तो थकान भूलकर खेलेंगे, सचमुच बेमानी है, हां अगर पैसे के लिए कोई काउंटी खेलना हो या विग्यापन करना हो तो अलग बात है।
अगर क्रिकेट कोच की तरह बयान देते तो निसंस्देह गेरी कर्स्टन यह नहीं कहते कि खिलाड़ी थक गए थे। आखिर २०-२० दो-चार घंटे का खेल होता है, इतनी तो खिलाड़ियों को कोच वैसे भी रोज प्रेक्टिस कराते हैं। गेरी पेशवर अंदाज में बोले, उन्हें अपने खिलाड़ियों का बचाव करना था और उसी रणनीति के तहत धोनी दूसरी बात बोले कि आईपीएल और थकान का कोई मतलब नहीं। क्रिकेट को खुदा मानने वाला भारतीय क्रिकेट प्रेमी इस सादगी पर कैसे न मर जाए? गैरी यह भी बोले कि खिलाड़ी चोटिल हुए और हम हार गए। चोटिल लेदेकर एक सहवाग हैं या बताए जाते हैं। उनकी भरपाई रोहित शर्मा ने कर ही दी थी, इसका ढिंढोरा अभ्यास मैच और बांग्लदेश तथा आयरलैंड के खिलाफ जीत के बाद पीटा भी गया था। तब परेशानी कहां रह गई।
असल में जिन जीतों के लिए धोनी श्रेय लेते रहे हैं, वे ज्यादातर सहवाग, गंभीर, युवराज और सचिन की पारियों पर टिकी होती हैं। जब बात धोनी के खेल पर आती है तो बाजी हाथ से निकल जाती है। पिछली तीन हारें, इसी बात की गवाह हैं। धोनी का खेल देखिए, ट्वेंटी-ट्वेंटी मैच और १२ गेंदों में महत्वपूर्ण पांच रन। अगर आप इस पर विचार करेंगे तो जान जाएंगे कि धोनी मानसिकरूप से कितना थक चुके हैं। अब उन्हें टीम से आराम दिए जाने की जरूरत है। दिनेश कार्तिक अच्छा खेल रहे हैं। वह विकेटकीपिंग और बल्लेबाजी में धोनी से ज्यादा विशेषग्य तरीके से खेलते हैं। पिछले दिनों उन्होंने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। उन्हें धोनी के स्टरडम की बलि नहीं चढ़ने देना चाहिए।
हमारे देश का बच्चा-बच्चा क्रिकेट और उसके पीछे की राजनीति को अच्छी तरह से पहचानता है। कोई भी खेल उसकी नजर से छिपा नहीं है। वैसे हार-जीत खेल का हिस्सा है, इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। पर लगातार हो रही हार पर विचार करना प्रबंधन की जिम्मेदारी है और उसके लिए किन खिलाड़ियों को आराम करना चाहिए और किन्हें खेलना यह फैसला करना प्रबंधन की जिम्मेदारी का हिस्सा है, इसे भी स्वीकार किया जाना चाहिए। प्रबंधन को इस दिशा में मजबूती दिखानी चाहिए। धोनी को कम से कम वेस्टइंडीज तो मत भेजिए? उसे थोड़ा आराम करने दीजिए, उसे थोड़े और विग्यापन करने दीजिए। आखिर वह थक गया है। वह भी तो इन्सान है।
जिस गली में तेरा घर हो फिजा
मोहल्लों वालों की इस परेशानी के बारे में आप हिन्दुस्तान के मंगलवार के अंक में विस्तार से पढ़ सकते हैं।
जिस गली में तेरा घर हो फिजा
मोहल्लों वालों की इस परेशानी के बारे में आप हिन्दुस्तान के मंगलवार के अंक में विस्तार से पढ़ सकते हैं।
Monday, June 15, 2009
चांद क्यों लोटा
Sunday, June 14, 2009
बेचारा धोनी थक गया
भाजपा की कलह
Wednesday, June 3, 2009
डार्विन से डुन तक, क्या सत्य शीर्षासन करता है?
सत्य भी शीर्षासन करता है? हालांकि यह पूरी तरह सापेक्ष स्थिति है उसके, जिस नजरिये से आप उसे देखते हैं। मौजूदा परिस्थितियों में प्रासंगिक हो गए हैं केविन डुन। यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न सिडनी के इस शोधकर्ता ने १० साल तक आस्ट्रेलियाई समाज का अध्ययन किया है। इस बीच वह १२ हजार ५०० लोगों से मिले। यह अवधि उस समय से दुगनी है, जो चार्ल्स डार्विन ने गैलापागोस द्वीप समूह पर प्रजातियों के अध्ययन में बिताया। डार्विन बीगल पर पांच साल तक सवार रहे। लौटकर अपने साथ क्रमविकास की जो अवधारणा लाए, उससे जीव विग्यान के एक नए युग का सूत्रपात हुआ। जैव विकास का यही सत्य डुन के अध्ययन में शीर्षासन करता नजर आता है। यह समाजशास्त्री बता रहा है कि कैसे किसी समाज में विकास के आधुनिक आवरण में भी पतनोमुखी रुझान दिखता है।
डुन की मानें तो हर १० में से एक आस्ट्रेलियाई नस्लवाद को ठीक मानता है। ये लोग जनजातीय समुदाय और अन्य संस्कृतियों के प्रति घृणा रखते हैं। इनका मानना है कि अन्य समुदायों को आधुनिक आस्ट्रेलियाई संस्कृति का हिस्सा बनने का कोई अधिकार नहीं है। पिछले साल सार्वजनिक किए गए इस अध्ययन में न्यू साउथ वेल्स में नस्लवाद का प्रभाव सबसे ज्यादा बताया गया है। डुन का अध्ययन आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हुए हमलों के माध्यम में देखने पर एक बड़ा प्रतिबिम्ब बनाता है। एक ऐसा बिम्ब जिस पर सिर्फ चिंता जताई जा सकती है और जिसकी भरपूर आलोचना ही की जा सकती है। इसी बिम्ब को अगर पूरे आस्ट्रेलियाई समाज के माध्यम से देखा जाए तो वह कुल आकार का सिर्फ १० फीसदी ही नजर आता है। दूसरे शब्दों में कहें तो नब्बे फीसदी आस्ट्रेलियाई नस्लवाद के किसी भी रूप के विरोधी है। जाहिर है कि महज १० फीसदी लोग किसी समाज की दिशा और मानक तय नहीं कर सकते। ये हमले कर कुछ समय के लिए भय फैलाने का काम तो कर सकते हैं, मगर जिन्हें अपनी योग्यता पर भरोसा है, वे इससे भयभीत होने वाले नहीं। यही वजह है कि इसी महीने अकेले चंडीगढ़ से आस्ट्रेलिया जाने वाले छात्रों की संख्या दो दर्जन से ज्यादा है।
यह दस फीसदी का जोखिम होनहारों की राह की बाधा नहीं बन सकता। इसे भोगपुर निवासी हरमनजोत सिंह के शब्दों में इस तरह कह सकते हैं, यह समय डरने का नहीं करियर बनाने का है। इसलिए सबकुछ जानते हुए भी मैं आस्ट्रेलिया जा रहा हूं।
हरमनजोत ऑटोमोटिव मेकेनिकल टेक्नोलॉजी की पढ़ाई के लिए मेलबर्न जा रहे हैं। उनकी फ्लाइट चार जून को है। उनके हौसले के लिए आप तालियां भी बजा सकते हैं। ऐसे ही हजारों-लाखों भारतीय अपनी योग्यता के बल पर अन्य देशों के विकास में योगदान कर रहे हैं। आईटी और सेवा के क्षेत्र में बारतीयों ने पूरी दुनिया में हमेशा बनी रहेगी। ये योग्य लोग भारतीय होंगे तो भारत भी तरक्की करेगा। योग्यता ही विकास का सत्य है। विश्वास कीजिए सत्य कभी शीर्षासन नहीं करता। यह सिर्फ नजर का फेर है।
( यह लेख आप आज के हिन्दुस्तान, चंडीगढ़ के पुलआउट सोहणी सिटी में भी देख सकते हैं)