Tuesday, June 30, 2009

सोने के सिक्के देने वाली मशीन

रुली बिश्नोई
सोने के सिक्के देने वाली मुर्गी भले ही हमें आज तक न मिली हो पर अब सोने के सिक्के देने वाली मशीन जरूर जर्मनी में लग चुकी है. नाम है इसका गोल्ड टू गो. फ्रेंकफर्ट एअरपोर्ट पर ये मशीन लग चुकी है. यह एटीऍम मशीन की तरह काम करती है. बस कार्ड डालिए और निकाल लीजिये एक, दस और ढाई सो ग्राम के सिक्के. वो भी बाजार से बीस फीसदी कम कीमत पर. और तो और ये सिक्के आपको गिफ्ट पैक में मिलेंगे. गोल्ड टू गो मशीन लगाने वाली कंपनी की योजना इस मशीन को स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, दुबई और आबुधाबी में लगाने की है. अब दुआ कीजिये की कम्पनी इसे भारत में भी लगा दे.
(पोपुलर साइंस से साभार)

इस बार

सीता का अपहरण कर
शादी के लिए दबाव नहीं डालेगा
और न ही इतना इंतजार करेगा
क्योंकि इसबार
वह दशानन के नहीं इन्सान के मुखौटे में है।।
-सुधीर राघव
(सुधीर राघव की अन्य कविताएं आप http://sudhirraghav.blogspot.com/ पर देख सकते हैं)

वर्षा का आनंद



करीब तीन सप्ताह के लंबे इंतजार के बाद चंडीगढ़ में सोमवार की रात बारिश हुई। मानसून का यह संगीत सुनने के लिए लोगों के कान तरस रहे थे। बादल बरसे और ठीक-ठाक बरसे। मंगलवार की सुबह भी रिमझिम रही मगर दोपहर को धूप निकल आई तो दो बजे के बाद फिर काली घटाएं छा गईं। रात में बारिश की फुहारों का लोगों ने खूब आनंद लिया, वे घरों से बाहर निकल आए। खासकर बच्चों ने रात १२ बजे तक नाहते हुए खूब मस्ती की। इसके फोटोग्राफ हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के सोमवार के अंक में भी देखे जा सकते हैं।

Monday, June 29, 2009

वर्षा

रिमझिम रिमझिम आती वर्षा
जीवन का राग सुनाती वर्षा
धूप तपी सूखी फसलों में,
फिर से जीवन लाती वर्षा।
गर्म रेत जब जलने लगता
तन से पानी चलने लगता
मांझी नाव किनारे रखता.
ऐसे में चुपके से आकर,
मेरी कागज की किश्ती को
बिन पतवार चलाती वर्षा।
गर्मी सताए नर-वानर को
और छोड़ वह अपने घर को
ताकने लगता जब अंबर को
ऐसे में चुपके से आकर
धूप तपे काले बदनों को
ठंडी राहत लाती वर्षा।
लगे कूकने कोयल वन में
मोर नाचने लगे उपवन में
उठने लगें हिलोरें मन में
ऐसे ही चुपके से आकर
रेतीले रेगिस्तानों में
नखलिस्तान बनाती वर्षा।।
-सुधीर राघव

(सुधीर राघव की अन्य कविताएं आप http://sudhirraghav.blogspot.com/ पर देख सकते हैं)

सोतड़ू: अलविदा जैक्सन

सोतड़ू: अलविदा जैक्सन
aachi or sachchi sradhanjali

चंडीगढ़ में 40000 गे

सोमवार को चंडीगढ़ के अखबारों ने यह चौंकाने वाली खबर दी कि ट्राईसिटी यानी पंचकूला और मोहाली को मिलाकर कुल ४० हजार गे हैं। स्टेट एड्स कंट्रोल सोसायटी के अश्वनि कुमार के हवाले से लिखा गया कि राष्ट्रीय एड्स कंट्रोल सोसायटी करीब ऐसे हजार लोगों की पहचान कर चुकी है। नैको के अनुमान के अनुसार यहां इनकी संख्या ४० हजार तक हो सकती है। पूरे देश में अनुमानित संख्या ढाई लाख है। सबसे गंभीर बात यह है कि इनमें एड्स और एचआईवी का प्रसार भी तेज गति से हो रहा है। यह दर करीब पांच फीसदी है।

कौन बनता है गे - इस संबंध में चिकित्सकों का कहना है कि जिन पुरुषों में पुरुष हार्मोन टेस्टेस्टेरोन कम होता है और जिन स्त्रियों में स्त्री हार्मोन की कमी होती है, उनमें समलैंगिकता का रुझान पाया जाता है। इसलिए इनका रुझान सीधे रूप में साथी से हार्मोन ग्रहण करने का रहता है। इसलिए इन लोगों में मुखमैथुन जैसी विसंगतियां भी पायी जाती हैं। यह सब उनमें कुदरती रूप से होता है।

कानून से अच्छी होगी चिकित्सीय मदद

हमारे समाज का ढांचा ऐसा है कि बच्चे इस तरह की इच्छाएं परिवार के सामने नहीं रख पाते हैं। इन लोगों को अगर किशोर अवस्था में चिकित्सीय मदद मिल जाए तो ऐसे रुझानों को पनपने से रोका जा सकता है। कानून में समलैंगिकों को राहत देने से अच्छा है कि इस ओर ध्यान दिया जाए। अप्राकृतिक कृत्यों को मान्यता देना सही नहीं है।

गे की गंदगी

सरकार अब समलेंगिग संबंधो को कानूनी रूप देने का मन बना रही है। सरकार के इस कदम से सम्लेंगिंगो का भला हो न हो समाज का नैतिक पतन होना अवस्वम्भावी है । पश्चिम के पेरेकारों ने हमारी संस्कृति को अपूर्णीय हानि पहुचाई है , परन्तु लगता है की अभी उनका दिल भरा नहीं है । अब दूसरो को क्या दोस देन जब हमारी सरकार ही देश का सत्यानास करने पर तुली हो। गे समर्थको का कहना है की कई देशों में इसे कानूनी मान्यता प्राप्त है। इसलिए अपने देश में भी इसे कानूनीजामा पहनाया जाए । इनका कहना है की इन्हें समान अधिकार दिए जाएँ. इन मूर्खों से पूछा जाये की इनके अधिकार छीने ही किसने थे. अब अगर ये उलटी गंगा बहायेंगे तो इन्हें अधिकार नहीं सजा मिलनी चाहिए. ये समाज ही नहीं प्रक्रति के भी दुसमन है. इनकी मांग मन्ना तो दूर सुननी भी नहीं चाहिए।

(http://bakbak-bishnoi।blogspot.com/ से साभार)

राहत की उम्मीद बंधी

बिजली-पानी की किल्लत झेल रहे चंडीगढ़ वालों के लिए मौसम विभाग की ओर से अच्छी खबर है। आज रात नहीं तो कल बारिश हो सकती है। हिमाचल की पहाडि़यों पर मानसून बरसने लगा है। ऐसे में हवा की गर्मी कुछ कम हुई है और लोग थोड़ी राहत महसूस कर रहे हैं। लेकिन प्रीमानसून बारिश न होने से सब्जीमंडी सूनी ही नजर आ रही है। आस-पास के किसान जो हरी सब्जियां लेकर आते थे, वे गायब दिख रही हैं। हिमाचल से आने वाली सब्जी भी कम हुई है। ऐसे में चंडीगढ़ के लोग जो मेहमाननवाजी के लिए जाने जाते हैं, रिश्तेदारों को फोन पर फिलहाल न आने को कह रहे हैं। सच में परेशानी काफी ज्यादा है। बरसात होते ही राहत दिखेगी। चेहरे फिर खिल जाएंगे।

Sunday, June 28, 2009

ये हमारा काम नहीं

वो आती है तो पूरा शहर जश्न मनाता है। लोगों के चेहरे खिल जाते हैं. और उसके जाते ही हो जाता है सन्नाटा. न घर में चैन न बाहर. पर अफ़सोस की पहले इसने मोहाली से मुहं मोरा और अब चंडीगढ़ को भी दरसन देने कम कर दिये हैं. खूब नखरे दिखा रही है बिजली रानी. दिखाएँ भी क्यों नहीं. आखिर हमने उसे इतना सर जो चढा लिया है. हवा और पानी से जरूरी जो बना लिया है. एक दिन भूखे तो रह सकते हैं पर बिन बिजली के नहीं. अब पुरवाई से हमें शीतलता का अहसास नहीं होता. अपनी काया को तो कूलर की हवा लगनी चहिये. सूरज की रोशनी से अपना गुजारा नहीं होता बलब रोशन होना चाहिए. कोढ़ में खाज यह है की इसे बर्बाद करने के भी पुरे प्रबंध हमने कर लिए है. बचत अब हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं रही. जब हम पानी ही नहीं बचा रहे तो हमसे बिजली की बचत की उम्मीद करना बेमानी है. भले ही सरकार हमसे कितनी ही विनती करे की बिजली बचाओ, नही तो अँधेरे में रहना परेगा. कौन परवाह करता है. परसासन ने चंडीगढ़ में लॉन सिचने पर रोक लगाई है. फिर भी अपने लॉन की घास का गला तो हम रोज तर करतें हैं भले ही परोसी के बच्चे प्यासे रह जाएँ. और मुर्ख सरकार हमसे उम्मीद कर रही है की हम बिजली बचायेंगे. हमारा कम बिजली, पानी बर्बाद करना और फिर इनकी कमी होने पर सरकार को कोसना है.

(http://bakbak-bishnoi।blogspot.com/ से साभार)

अब चंडीगढ़ में भी बिजली के लिए हाय-तौबा

चंडीगढ़ में अमूमन अघोषित बिजली कट नहीं लगते, मगर मानसून की देरी ने यहां भी हालात बिगाड़ दिए हैं। भयंकर गर्मी पड़ रही है, जिसके चलते बिजली की मांग भी ३०० मेगावाट के आसपास पहुंच गई है। सेक्टर २,४,९.१०.११.२२.३७, ४१, ४९, ५० में बुरा हाला है। सेक्टर २० के लोगों ने तो बिजली न होने पर शनिवार रात बिजली दफ्तर पर प्रदर्शन किया। दिन में सेक्टर ५२ के बिजली घर में लाइन ट्रिप होने से सेक्टर ३५ सहित करीब सात सेक्टर में बिजली चार से पांच घंटे गायब रही। प्रशासन ने गर्मी को देखते हुए अब निजी स्कूलों में भी छुट्टियां सात जुलाई तक बढ़ाने का एलान कर दिया है। इससे पहले सरकारी स्कूलों के लिए यह एलान किया जा चुका है। हालांकि इस संबंध में निजी स्कूलों के संचालक अभी कोई फेसला करने के मूड में नहीं थे।

हालांकि मैसम विभाग की ओर से सूचना है कि सोमवार या मंगलवार तक बरसात हो सकती है।।

(यह खबर विस्तार से आप हिन्दुस्तान के आज के अंक में पढ़ सकते हैं)

गागर में सागर का स्वाद

-सुधीर राघव
काव्यांजलि चंडीगढ़ साहित्य अकादमी का एक अनूठा प्रयास है। एक ही संकलन में चंडीगढ़ और आसपास के ८९ कवियों को रखा गया है। इस तरह एक बेहद जटिल काम संपन्न किया गया है। इसके बावजूद संकलन संग्रहणीय है,.क्योंकि यह क्षेत्र की प्रतिभा संपदा से परिचय करवाता है। इसमें कुछ स्थापित साहित्यकार हैं तो साहित्य की पगडंडियों के नए पथिक भी। काव्यांजलि के कवि के लिए अगर आप कोई एक चेहरा तलाशें तो नहीं ढूंढ पाएंगे। इसलिए समीक्षाकर्म भी कठिन है। एक ही जगह इतनी विभिन्नता जुटा लेने के लिए डॉ. धर्मस्वरूप गुप्त और उनका संपादक मंडल बधाई का पात्र है। संकलन में कई ऐसे नाम हैं, जो आकर्षण जगाते हैं, कुछ नए बिम्ब भी हैं, जो ताजगी का एहसास करता हैं। सुनील प्रभाकर की कविता -मैं कहां हूं- में इसकी बानगी देखिए-

आज़ादी के दरख्त पर

एक भी हरी पत्ती नहीं

जिससे गरीब आदमी की

मरी उम्मीदों को ढंका जा सके

उर्मिल सखि की कविता में भी ऐसे ही बिम्ब नजर आते हैं। इसके
इलावा जयश्री की कविता में छायावाद, बलवीर संधु में प्रगतिवाद और योजना रावत में आप नई कविता तलाश सकते हैं। इस तरह इस संकलन की कविताएं एक समयकाल की होकर भी अलग-अलग प्रथाओं का अनुसरण करती हैं। कुल मिलाकर इस काव्य संकलन में आपको काव्य की अनेक धाराएं एक साथ बहती दिखाई देंगी। जब बहुत सी धाराएं एक ही जगह गिरती हैं तो सागर बनता है। संभव है सभी धाराओं का स्वाद मीठा हो मगर सागर का स्वाद इससे इतर होता है। उसका अपना स्वाद होता है। यही अलग स्वाद आपको इस संकलन में भी मिलेगा।


(यह समक्षा आप हिन्दुस्तान के २८ जून २००९ के अंक में कलम पृष्ठ पर भी पढ़ सकते हैं)

Saturday, June 27, 2009

स्कूलों की छुट्टियां बढ़ीं

चंडीगढ़ शिक्षा विभाग ने सरकारी स्कूलों की छुट्टियां सात जुलाई तक बढ़ाने का फैसला किया है। यह फैसला यहां पड़ रही भीषण गर्मी को देखते हुए किया गया है। मानसून लेट होने से इस बार बुरा हाल है। बिजली-पानी के संकट का खतरा भी मंडराने लगा है। उम्मीद की जा रही है कि जुलाई के पहले सप्ताह तक मानसून पहुंच जाएगा और राहत मिलेगी। इसी आधार पर छुट्टियां बढ़ा दी गई हैं। हालांकि प्राइवेट स्कूलों ने इस संबंध में अभी कोई फैसला नहीं किया है। लेकिन उनका कहना है कि अगर मौसम नहीं सुधरता है तो वे ३० जून को इस संबंध में फैसला लेंगे।

Friday, June 26, 2009

कहानी-किस्सा की कविताएं

हुनर
पहले आदमी बाजार में आया
अपना हुनर बेचने।
फिर औरत भी बाजार पहुंची
खुद को बेचने।
...यह भी आदमी का ही हुनर था।।

खेत
शहर की ओर जाती सड़क से खेत की मिट्टी ने पूछा,
दस साल पहले तू मेरे किसान को ले गई थी,
वह लौटकर नहीं आया।
अगले दिन सड़क किसान को शहर से ले आई।
उसके अगले दिन किसान खेत बेचकर फिर शहर चला गया।।

पेट
किसान के पेट ने कहा-मैं भूखा हूं,
कल से कुछ नहीं खाया।
किसान सोचने लगा-
भगवान गरीब को ऐसा पेट क्यों देता है
जो न गांव में भरता है और न शहर में।।
-सुधीर राघव

पीजीआई में पीलीया

चंडीगढ़ पीजीआई के १३ रेजिडेंट डॉक्टरों में हेपेटाइटिस-ए का संक्रमण मिला है। इन सभी डॉक्टरों की टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद उन्हें पीजीआई में ही भर्ती कर लिया गया है। इस बीमारी का कारण जानने के लिए डॉक्टरों के हॉस्टल और मैस के पानी की जांच भी की गई है। पीजीआई की प्रवक्ता मंजू वा़डवालकर का कहना है कि पानी की जांच रिपोर्ट सही पायी गई है। संक्रामित होने वाले डॉक्टर अलग-अलग विभागों से है।
(यह खबर हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के शुक्रवार के अंक में विस्तार से देखी जा सकती है)

Thursday, June 25, 2009

१। जड़ता के खिलाफ

सीना ताने पहाड़ ने
आदमी से कहा
देखो मेरी महानता
देखो मेरी शान
तुम क्या जानते हो?
आदमी ने कहा-
मैं चलना जानता हूं।
...और पहाड़ आदमी के पांव के नीचे था।

२. अकड़ का जन्म
आदमी ने हिमालय से पूछा-
तुम पत्थर कैसे हुए
तुम में इतनी अकड़ कहां से आई?
हिमालय ने कहा-
दबाव से
मेरा जन्म धरती के दो खंडो के
टकराने से उत्पन्न दबाव से हुआ है
वरना तो मैं पहले कोमल मिट्टी था।

३। मोक्ष
अपने ही बोझ से मिट्टी होते पहाड़ से
ऊपर उग आए फूल-पौधे ने कहा-
तुम्हारी अकड़ गई पहाड़
तुम अब मिट्टी हो रहे हो।
पहाड़ ने कहा-
जब अकड़ थी
तब अकेला था
अब जीवन किलकारी भरता है
यह मौत नहीं मोक्ष है।
-सुधीर राघव

अभी मत रोपो धान

यह समय है, जब उत्तर भारत में मानसून के स्वागत में मल्हार गए जाते हैं, मगर अब सूखे का संकट है और किसान का कवि मन अशांत। मेढ़क-मेढ़की की शादी, महिलाओं का खेत में हल चलाना और तरह-तरह के टोटके बारिश के लिए किए जा रहे हैं। पर इंद्र देव पसीज नहीं रहे। मौसम विग्यानी कह रहे हैं कि मानसून भटक गया है। बादलों की चाह में आकाश निहारते किसी बेचारे किसान से पूछे तो यही कहता है कि यह तो घोर कलियुग का प्रताप है। इतने पाप हो रहे हैं तो ऐसा ही होगा। खेर जो भी हो यह वक्त बातों का नहीं कुछ करने का है। थोड़ी सी समझदारी काफी मदद कर सकती है।

नुकसान से कैसे बचें किसान
धान की रोपाई का यह सीजन है। किसान चिंता में है कि वह क्या करे। पनीरी तैयार है। खेत में पानी के लिए ट्यूवैल का सहारा है। कुछ जोशिले किसान ट्यूवैल चलाकर खेत रोप भी रही हैं। पर वे ज्यादा जोख म उठा रहे हैं। किसानों को चािहए कि वे धान की रोपाई से पहले बारिश का इंतजार कर लें। संभव है देर से रोपाई के चलते धान का उत्पादन कुछ कम हो मगर इससे वे और बड़े नुकसान से बच सकते हैं। ट्यूबवैल से सिंचाई करने पर िबजली और डीजल का खर्च अलग से पड़ेगा और जुताई-बुवाई के बाद भी अगर फसल बिना पानी के सूख जाती है तो नुकसान काफी उठाना पड़ेगा।

Wednesday, June 24, 2009

चंडीगढ़ में बढ़ती गर्मी

पिछले चार दिन से चंडीगढ़ में पारा लगातार चढ़ रहा है। अब यह ४४ डिग्री के आसपास है। हिमाचल की तराई के इस इलाके की तरावट गायब है। इससे पहले २००७ में पारा ४५ डिग्री से ऊपर पहुंच गया था और उससे पहले १९९५ में इतनी गरमी पड़ी थी। यदि दो तीन दिन में बारिश नहीं आती है तो पिछले सारे रिकार्ड टूटना तय है। गर्मी के चलते मोहाली गांव में डायरिया के मरीजों की संख्या सौ का आंकड़ा पार कर गई है। इन सभी को सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसके अलावा हैजा के भी पांच मरीज मिले हैं। बस्तियों और कालोनियों में साफ-सफाई का उचित प्रबंध न होने से दिक्कत बढ़ रही हैं.। चंडीगढ़ की कालोनी नंबर पांच और नेहरू कालोनी में भी सफाई व्यवस्था चौपट है। वहां भी कोई बीमारी पेर पसार सकती है। अखबारों ने मंगलवार के अंक में मौसम और बीमारी को ही मुख्य खबर रखा है।
(इस संबंध में आप विस्तार से चंडीगढ़ हिन्दुस्तान के मंगलवार के अंक में पढ़ सकते हैं।)

Tuesday, June 23, 2009

अल्लाह का बंदा और दिल हिन्दुस्तानी

अल्लाह के बंदे फेम केलाश खेर चंडीगढ़ आए तो सोमवार को हिन्दुस्तान के कार्यालय भी पहुंचे। वह काफी जिंदादिल इन्सान हैं। हर चीज को लेकर उनका अपना स्पष्ट नजरिया है, और वह लय ताल तलाश लेते हैं। हिन्दुस्तान कार्यालय में उनके कुछ चित्र जो मंगलवार के चंडीगढ़ के अंक में छपे हैं, वह इसकी मिसाल हैं। उन्हें आप भी देख सकते हैं।








Sunday, June 21, 2009

कला बाजार ः देह की दुनिया की पड़ताल


पुस्तक समीक्षा
अभिग्यात का उपन्यास कला बाजार कला, साहित्य, मॉडलिंग और पत्रकारिता के अंदर की दुनिया की पड़ताल है। इसकी पृष्ठभूमि भी खासा विस्तृत है, जो पूर्व में कोलकाता से लेकर पश्चिम में अमृतसर तक फैली है। एक-एक कर कड़ियां जुड़ती हैं और कथ्य रोचक बन पड़ा है।
सामाजिक सरोकारों तथा नैतिक मूल्यों में पिछले एक-डेढ़ दशक में जो बदलाव आए हैं उन्हें लेकर अब बहस भी अब बासी और फीकी लगने लगी है। लेखक ने इसी बहस की उपेक्षा की है और अपनी बात बेबाकी से रखी है। उसका यही अंदाज इस उपन्यास को समय के साथ लाकर खड़ा कर देता है। वैसे विवाहेतर और समलेंगिक संबंधों पर जो कुछ लिखा जाता रहा है, उसमें संस्कार में लिपटे होने का भ्रम वह झिझक पैदा करता है कि अक्सर लेखक समाज से दो कदम पीछे ही रह जाता है। अभिग्यात उन्हीं वर्जनाओं को लांघ गए हैं, इसलिए आत्मकथ्य शैली में लिखा गया यह उपन्यास काल्पनिक होते हुए भी आत्मकथा लगता है।
उपन्यास के स्त्री पात्र अपने देहतर वजूद के लिए दौड़ते हैं मगर पुरुष समाज का दृष्टिकोण देह शक्ति के उनके भ्रम को टूटने नहीं देता। मोरा उसकी मां रत्ना हो या रीता ये सभी देह के चक्रव्यू में नैतिक मूल्यों को पराजित करती हैं और खुद भी उसी देह से परास्त होती हैं।
कला बाजार में यही है देह की शक्ति, यह ब्लैकहोल की तरह सबकुछ निगल लेती है। इसमें जो डूबते हैं वे पछताते हैं और बिना डूबे कोई रह नहीं पाता। इस तरह उपन्यास का दर्शन, उसकी रोचकता और विस्तार उसे पठनीय बना देता है।
संभवतः लेखक के विचारों से सहमत हो पाना सहज न हो मगर ऐसे विचार आपके चारों ओर घूमते हैं, बिना आपकी सहमति के इंतजार के।

(यह समीक्षा आप हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के रविवार के अंक में भी पढ़ सकते हैं।)

Saturday, June 20, 2009

गलतफहमी

-सुधीर राघव

कविता सिर्फ कल्पना नहीं होती

कविता कोरा सच भी नहीं होती

कविता नाजुक मन का धर्म है

यह मान लेना भी एक भ्रम है

कविता कल-कल करती नदी है

या ऊंघती-जागती कोई सदी है

कविता सुरों पर साधे राग हैं

या रसबेरियों के लदे बाग हैं

कविता कोई दबी सी आग है

या आकाश का टूटा भाग है

कविता जल का तीव्र आवेग है

या पवन का झूमता सा वेग है

कविता सिर्फ जमीं नहीं होती

कविता सिर्फ जल नहीं होती

कविता सिर्फ वायु नहीं होती

कविता सिर्फ आकाश नहीं होती

कविता सिर्फ अग्नि नहीं होती

कविता कवि की गलतफहमी भी होती है।

नफरत की राजनीति की माया

अस्सी और नब्बे का दशक देश में नफरत फैलाने का दौर था। इस दौर में जितने भी कुकरमुत्ते नेता पैदा हुए, उतने किसी और दौर में नहीं। धर्म के नाम पर जाति के नाम पर, संप्रदाय के नाम पर, जिसने जितनी नफरत फैलाई वह उतना ही बड़ा नेता बना। राम जाने ये लोग किससे प्रेरित थे। खेर नई सदी आई, लोग जागे और इन बड़े नेताओं को हांसिए पर धकेलने का काम शुरू हुआ। उत्तर प्रदेश की ज्यादा आबादी में अशिक्षा और रूढ़ियों की दलदल में ऐसे नेता खूब पनपे। महात्मा गांधी को ऐसे नेता गाली देना अपना धर्म समझते हैं। इनकी बातों में आपको सिर्फ नफरत ही मिलेगी। जहां नफरत हो, वहां गांधी को गाली ही मिलेगी।

स्वर्गीय कांशीराम अपने गृह राज्य पंजाब में कोई बहुत प्रभावशाली संगठन खड़ा नहीं कर पाए। वहां, जब-जब बसपा मतबूत हुई, वह तब-तब ही टूटी। दूसरी और यूपी में मायावती के साथ मिलकर वह भी हिट हो गए। आडवाणी भी यूपी में ही हिट हुए। मोदी और वरुण को भी यहां खूब सम्मान मिला। नफरत की राजनीति में रुचि दिखाने का खामियाजा ही उत्तर प्रदेश ने भुगता है और हर मोचर्चे पर यह प्रदेश लगातार पिछड़ता रहा। अब उसे ऐसे ही नेता मिल रहे हैं। मुलायाम हो, मायावती हो या कल्याण सिंह, सबकी बोली और शैली कमोवेश एक जैसी ही है।

पर अब लगता है कुछ सुधार आ रहा है। भले ही माया और मुलायम न सुधरें, पर पिछला लोकसभा चुनाव गवाह है कि लोग सुधर रहे हैं।

Friday, June 19, 2009

अजन्मे बच्चे का भी हो सकता है डीएनए टेस्ट

पीजीआई के विशेषग्यों का कहना है कि गर्भ में पल रहे बच्चे का भी डीएनए टेस्ट हो सकता है। असल में चंडीगढ़ के नारी निकेतन में एक विक्षिप्त लड़की के बलात्कार के बाद गर्भवती होने का मामला आजकल चर्चा में है। लड़की गर्भपात कराया जाए या न इसे लेकर मामला अदालत में विचाराधीन है। समझा जाता है कि गर्भपात का फैसला अगर टलता है तो आरोपी को फायदा मिल सकता है, क्योंकि तब बच्चे के जन्म के बाद ही डीएनए टेस्ट हो सकेगा।

विशेषग्यों का कहना है कि गर्भ में मौजूद एमियोटिक फ्लयूड से सैंपल लेकर डीएनए जांच की जा सकती है और बच्चे के पिता का निर्धारण हो सकता है। मगर इस काम में सावधानी बरतने की जरूरत हैं।

Wednesday, June 17, 2009

ओबामा का नेहरू मॉडल

सुधीर राघव

साम्यवाद की अवधारणा की साख टूटे अभी दो दशक गुजरे हैं, पूंजीवाद का डंका बजा रहे बाजार की जड़ें इस मंदी में बुरी तरह से हिल गई हैं। मुक्त बाजार के समर्थक अब नकेल की बात कर रहे हैं। अमेरिका भी अब अर्थतंत्र का नेहरू मॉडल अपनाने जा रहा है, जिसे लालफीताशाही कहकर बाहर ही नहीं अपने देश में भी गरिया जाता रहा है। बराक ओबामा ने बड़े वित्तीय सुधारों की घोषणा की है। इसके तहत बैंकिंग प्रणाली पर निगरानी और नियंत्रण के लिए अलग से विभाग भी बनेंगे।
असल में नेहरू अपने समय की दो सबसे लोकप्रिय धाराओं साम्यवाद और पूंजीवाद से अलग अवधारणा पर चले। वह मानते थे कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं है, इसलिए वह ऐसे काम निजी क्षेत्र के हाथों में ही रखना चाहते थे, पर इस सोच के बावजूद वह पूंजीवादी नहीं हो पाए, उनका मानना था कि गरीब भारत में पिछड़े क्षेत्रों में संसाधन खड़े करने का जोखिम कोई उद्योगपति नहीं लेगा अतः इन क्षेत्रों में सरकार को पहल करनी होगी, तथा व्यापक जन प्रभाव वाले क्षेत्र भी सरकार की देखरेख में होने चाहिए। संभवतः नेहरू ने उस समय की दोनों विश्वशक्तियों के बीच सामंजस्य बैठाते हुए एक मजबूत राष्ट्र तैयार करने के लिए यह मॉडल अपनाया हो मगर इस मंदी ने मुक्त बाजार के समर्थकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वित्तीय सेक्टर को खुले सांड की तरह नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि यह सिर्फ उत्पादन ही नहीं बढ़ाता बल्कि विनाश भी कर सकता है। इस क्षेत्र की गलतियां सबको भुगतनी पड़ती हैं। उनके असर से कोई नहीं बच सकता। इसलिए जरूरी है कि इस सांड को खूंटे का बैल बनाया जाए।
हालांकि कार्ल मार्क्स वर्ग संघर्ष के वजह से पूंजीवाद का अंत मानते हैं, मगर मौजूदा परिस्थितियों को देखकर लगता है कि नेहरू मॉर्क्स से ज्यादा दूरदृष्टा साबित हुए। न तो पूंजी का महत्व कम होने वाला है और न ही समाज का। असली रास्ता इन दोनों के बीच से होकर जाता है। इनके बीच का संतुलन ही सबसे बड़ा सिद्धांत है। इसलिए मार्क्स और कैंजे दोनों से कम गुणाभाग करने के बावजूद नेहरू अधिक व्यवहारिक आर्थिक अवधारणा अपने पीछे छोड़ गए हैं।

Tuesday, June 16, 2009

थकने की तुम्हारी जिद्द धोनी

सुधीर राघव


टी-२० की बादशाहत इतनी बुरी तरह से छिनेगी, किसी ने सोचा भी नहीं था। हार के कारणों का ठीकरा फोड़ने के लिए हमेशा बलि के बकरे तलाशे जाते हैं। कुछ दिग्गज कंपनियां और मीडिया के हिस्से यह कभी नहीं चाहेंगे कि उनके वे सितारे जिन पर अरबो रुपए का दांव लगा है, उनके खेल और कौशल पर कोई अंगुली उठे। इसलिए दूसरी हार के बाद तत्काल समीक्षा आ गई कि आईपीएल खेलकर थक गए थे धोनी और उनके धुरंधर। वही आईपीएल जिसे खेलकर क्रिस गेल जैसे दर्जनों खिलाड़ी और चमक तथा निखर गए, हमारे धुरंधर थक गए। हो सकता है कि उन्होंने थकने की जिद ठानी हो, तभी तो पद्म सम्मान लेने के लिए न्यौते गए इन खिलाडि.यों ने दिल्ली में पहुंचकर भी राष्ट्रीय सम्मान से किनारा किया और विग्यापन की शूटिंग में लगे रहे। मामला उठा भी और दब भी गया। जिन्हें राष्ट्रीय सम्मान की चिंता न हो, उनसे यह उम्मीद करना कि जब वे देश के लिए खेल रहे हों तो थकान भूलकर खेलेंगे, सचमुच बेमानी है, हां अगर पैसे के लिए कोई काउंटी खेलना हो या विग्यापन करना हो तो अलग बात है।

अगर क्रिकेट कोच की तरह बयान देते तो निसंस्देह गेरी कर्स्टन यह नहीं कहते कि खिलाड़ी थक गए थे। आखिर २०-२० दो-चार घंटे का खेल होता है, इतनी तो खिलाड़ियों को कोच वैसे भी रोज प्रेक्टिस कराते हैं। गेरी पेशवर अंदाज में बोले, उन्हें अपने खिलाड़ियों का बचाव करना था और उसी रणनीति के तहत धोनी दूसरी बात बोले कि आईपीएल और थकान का कोई मतलब नहीं। क्रिकेट को खुदा मानने वाला भारतीय क्रिकेट प्रेमी इस सादगी पर कैसे न मर जाए? गैरी यह भी बोले कि खिलाड़ी चोटिल हुए और हम हार गए। चोटिल लेदेकर एक सहवाग हैं या बताए जाते हैं। उनकी भरपाई रोहित शर्मा ने कर ही दी थी, इसका ढिंढोरा अभ्यास मैच और बांग्लदेश तथा आयरलैंड के खिलाफ जीत के बाद पीटा भी गया था। तब परेशानी कहां रह गई।


असल में जिन जीतों के लिए धोनी श्रेय लेते रहे हैं, वे ज्यादातर सहवाग, गंभीर, युवराज और सचिन की पारियों पर टिकी होती हैं। जब बात धोनी के खेल पर आती है तो बाजी हाथ से निकल जाती है। पिछली तीन हारें, इसी बात की गवाह हैं। धोनी का खेल देखिए, ट्वेंटी-ट्वेंटी मैच और १२ गेंदों में महत्वपूर्ण पांच रन। अगर आप इस पर विचार करेंगे तो जान जाएंगे कि धोनी मानसिकरूप से कितना थक चुके हैं। अब उन्हें टीम से आराम दिए जाने की जरूरत है। दिनेश कार्तिक अच्छा खेल रहे हैं। वह विकेटकीपिंग और बल्लेबाजी में धोनी से ज्यादा विशेषग्य तरीके से खेलते हैं। पिछले दिनों उन्होंने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। उन्हें धोनी के स्टरडम की बलि नहीं चढ़ने देना चाहिए।
हमारे देश का बच्चा-बच्चा क्रिकेट और उसके पीछे की राजनीति को अच्छी तरह से पहचानता है। कोई भी खेल उसकी नजर से छिपा नहीं है। वैसे हार-जीत खेल का हिस्सा है, इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। पर लगातार हो रही हार पर विचार करना प्रबंधन की जिम्मेदारी है और उसके लिए किन खिलाड़ियों को आराम करना चाहिए और किन्हें खेलना यह फैसला करना प्रबंधन की जिम्मेदारी का हिस्सा है, इसे भी स्वीकार किया जाना चाहिए। प्रबंधन को इस दिशा में मजबूती दिखानी चाहिए। धोनी को कम से कम वेस्टइंडीज तो मत भेजिए? उसे थोड़ा आराम करने दीजिए, उसे थोड़े और विग्यापन करने दीजिए। आखिर वह थक गया है। वह भी तो इन्सान है।

जिस गली में तेरा घर हो फिजा

मोहाली के सेक्टर ४८ के उस मोहल्ले के लोग आजकल खासा परेशान हैं, जिसमें फिजा का घर है। फिजा वही जो हरियाणा के मुख्यमंत्री चंद्रमोहन से शादी कर चर्चा में है। दोनों की शादी हो या तकरार, फिजा पत्रकारों को फोन कर सेक्टर ४८ में बुला लेती है। प्रेस कान्फ्रेंस घर की चारदिवारी में नहीं होती है। यह होती बाहर सार्वजनिक पार्क में। प्रेस कान्फ्रेंस अमूमन शाम को छह-सात बजे के आसपास बुलाई जाती है, जब बच्चों के खेलने का वक्त होता है, या बड़े-बुजुर्ग टहलने निकलते हैं। ऐसे में वहां पत्रकारों का जमघट लगा होता है और बीच में यह जोड़ा होता है। बच्चों के लिए यह तमाशा भर होता है। मोहल्ले वालों का कहना है कि इस जोड़े की हरकतों से बच्चों पर बुरा असर पड़ रहा है। रविवार से लगातार दो दिन प्रेस कान्फ्रेंस हुई। ऐसे मोहल्ले वालों का भी धैर्य जवाब दे गया, उनका कहना है कि अब वे पार्क में इन दोनों को प्रेस कान्फ्रेंस नहीं करने देंगे। वैसे भी गली में बाहरी लोगों का आनाजान बना रहता। कभी चांद-फिजा के विरोधी वहां आकर प्रदर्शन करते हैं तो कभी उनके समर्थक जमघट लगा लेते हैं। इसके चलते रविवार रात गोली भी चली।
मोहल्लों वालों की इस परेशानी के बारे में आप हिन्दुस्तान के मंगलवार के अंक में विस्तार से पढ़ सकते हैं।

जिस गली में तेरा घर हो फिजा

मोहाली के सेक्टर ४८ के उस मोहल्ले के लोग आजकल खासा परेशान हैं, जिसमें फिजा का घर है। फिजा वही जो हरियाणा के मुख्यमंत्री चंद्रमोहन से शादी कर चर्चा में है। दोनों की शादी हो या तकरार, फिजा पत्रकारों को फोन कर सेक्टर ४८ में बुला लेती है। प्रेस कान्फ्रेंस घर की चारदिवारी में नहीं होती है। यह होती बाहर सार्वजनिक पार्क में। प्रेस कान्फ्रेंस अमूमन शाम को छह-सात बजे के आसपास बुलाई जाती है, जब बच्चों के खेलने का वक्त होता है, या बड़े-बुजुर्ग टहलने निकलते हैं। ऐसे में वहां पत्रकारों का जमघट लगा होता है और बीच में यह जोड़ा होता है। बच्चों के लिए यह तमाशा भर होता है। मोहल्ले वालों का कहना है कि इस जोड़े की हरकतों से बच्चों पर बुरा असर पड़ रहा है। रविवार से लगातार दो दिन प्रेस कान्फ्रेंस हुई। ऐसे मोहल्ले वालों का भी धैर्य जवाब दे गया, उनका कहना है कि अब वे पार्क में इन दोनों को प्रेस कान्फ्रेंस नहीं करने देंगे। वैसे भी गली में बाहरी लोगों का आनाजान बना रहता। कभी चांद-फिजा के विरोधी वहां आकर प्रदर्शन करते हैं तो कभी उनके समर्थक जमघट लगा लेते हैं। इसके चलते रविवार रात गोली भी चली।
मोहल्लों वालों की इस परेशानी के बारे में आप हिन्दुस्तान के मंगलवार के अंक में विस्तार से पढ़ सकते हैं।

Monday, June 15, 2009

चांद क्यों लोटा

सबके जेहन में एक ही सवाल है कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि तलाक-तलाक कहने के बाद फिर चांद लोट आया फिजा के पास। यह प्रेम है? अब इस पर कोई विश्वास करने को राजी नहीं। यह कोई सौदेबाजी है? लोग अपनी-अपनी तरह से अटकलें लगा रहे हैं। चांद-फिजा के किस्से में इतने मोड़ आए हैं कि अब इसे कोई गंभीरता से नहीं लेता। यह सिर्फ चैनलों और अखबारों में समाचार के बीच स्ट्रेस बस्टर का काम करता है। हो सकता है कि अब इस कहानी में कोई और मोड़ आए। एकता कपूर के सीरियल्स की तरह अब चांद-फिजा सीरीज के पाठकों और दर्शकों में भी यह जिग्यासा है। चांद क्यों लोटा? दोनों ने चुपचाप अचानक शादी क्यों की? शादी के बाद फिर अचानक चांद गायब क्यों हुआ? गायब होने के बाद उसने लंदन से फोन कर फिजा को तलाक-तलाक क्यों कहा? इन सब सवालों के जवाब आपकों मिलेंगे मगर ब्रेक के बाद। बस देखते और पढ़ते रहें चांद-फिजा की यह सीरीज। यह समाचार भी है और रियल्टी शो भी? आपको इसमें किसका अभिनय ज्यादा पसंद आया हमें अवगत कराएं। आप अपनी टिप्पणी नीचे टिप्पणी के कॉलम में दे सकते हैं? धन्यवाद...

Sunday, June 14, 2009

बेचारा धोनी थक गया

सहवाग की अनुपस्थिति में बांग्लादेश और आयरलैंड को हराकर भारतीय टीम ऊंचे मनोबल के साथ टी-२० के सुपर ८ मुकाबले में पहुंची। सुपर-८ मुकाबले में वह वेस्टइंडीज के आगे बोनी साबित हुई और उसके बाद इंगलैंड के आगे तो धोनी के धुरंधर भीगी बिल्ली बन गए। यह शायद बहुत ही निराशारजनक है कि धोनी और युसूफ पठान क्रीज पर डटे थे और भारत लक्ष्य पूरा नहीं कर सका। सहवाग या युवराज के रहते ऐसा होता तो पूरा मीडिया उनके पीछे पड़ जाता। असल में धोनी काफी समय से क्लिक नहीं कर पा रहे हैं। टी-२० में वह भारत की ओर से ऐसे बल्लेबाज हैं, जो ज्यादा गेंद खेलकर कम रन बना रहे हैं। वेस्ट इंडीज के मैच में भी उन्होंने टेस्ट की तरह खेलकर हार की नींव रखी। कप्तान के तौर पर वह जो प्रयोग करते हैं, वे तुक्के भी उनके इंगलैंड में नहीं चल पा रहे हैं। अभ्यास मैच में रोहित शर्मा के चलते ही सहवाग को बहार का रास्ता दिखाया गया, पहले जिसे विवाद बताया गया वह बाद में कारण बनकर चोट निकला। अब सच क्या है, यह या तो धोनी और सहवाग जानते हैं या फिर भगवान। हो सकता है कि क्रिकेट के भगवान सचिन भी इससे अनजान हों। हो सकता है कि कप्तानी करते-करते धोनी थक गए हों, वह इस मैच में थके और हताश नजर आए। इसलिए खुद न आकर उन्होंने जडेजा को बल्लेबाजी करने भेज दिया। युसुफ पठान ने जहां मात्र १७ गेंदों में ३३ रन बनाए, वहीं धोनी २० गेंद खेल कर भी ३० रन बना सके, यही ३ रन भारत की हार का कारण बने। यह समय है जब कप्तान के तौर पर युवराज को भी मौका दिया जाए।

भाजपा की कलह

सुधीर राघव एक हारी हुई हताश पार्टी में कलह की हमेशा वजह निराशा नहीं होती, कलह की वजह वह आशा भी होती जो पदों को हथियाने और भविष्य की सत्ता के सपने से उत्पन्न होती है। लालकृष्ण आडवाणी अपनी पारी घोषित करने वाले हैं, आखिर उम्र अब उनके साथ नहीं है। पर उनकी रिटायरमेंट अटल बिहारी वाजपेयी जितनी शालीन नहीं दिख रही। वजह संन्यास के लिए संन्यासी जैसी प्रवृति चाहिए, जो आडवाणी के पास नहीं है। उनका मोह हमेशा उनकी विफलता की वजह बना। इसीके चलते उन्होंने खुद को बार-बार बदला और लोगों के बीच अपनी विश्वसनीयता गंवाई। उनका उदय राजनीति में कट्टरवादी विचारधारा के साथ हुआ। उन्हें देर से समझ में आया कि कोई कट्टरपंथी देश का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। यह उन्होंने हो सकता है अटल बिहारी वजपेयी से सीखा हो। अपनी छवि बदलने के लिए वह पाकिस्तान गए और जिन्ना की समाधि के आगे नतमस्तक हो गए। वह भूल गए कि देश में वह जिस विचार को उन्होंने जन्म दिया था और जिसे धारा में भी बदल दिया था, यह उसीकी हत्या के समान था। शायद वह भारतीय राजनीति को एक सर्कस से ज्यादा कुछ नहीं मानते, जिसमें एक ही जोकर बार-बार नकाब बदल कर दर्शकों के सामने नए करतब दिखाता रहता है और तालियां बटोरता है। हो सकता है कि पराजय के बाद उन्हें समझ में आया हो कि वह गलत हैं। भारतीय राजनीति अब महज सर्कस का लोग नहीं है। शिक्षित लोगों की संख्या समाज में लगातार बढ़ रही है। इसलिए उन्होंने संन्यास की बात की, पर इससे भी पलट गए। सिर्फ इस मोह के चलते कि उनके बाद कहीं उनके चेले अनाथ न हो जाएं। उन्हें पार्टी में मजबूत करने के लिए विचार त्याग दिया। कहते हैं मोह में फंसे व्यक्ति का पद और प्रतिष्ठा दोनों जाते हैं, यही डर मुझे है कि कहीं इस नेता से पार्टी में अंतत ऐसा ही सलूक न हो। पीएम इन वेटिंग का पद वह गंवा चुके हैं, अब यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह, अरुण शोरी और मुरली मनोहर जोशी जैसे भाजपा के विद्वान चेहरों पर जो भाव हैं, वह पार्टी में किसी बड़े चक्रवात के सक्रिय होने के संकेत हैं। जिस तरह अरुण जेटली को विपक्ष का नेता बना दिया गया और सुष्म स्वराज अडवाणी ने लोकसभा में पार्टी का उपनेता बनाया, उससे उन्होंने पार्टी के बारे में न सोचकर सिर्फ अपने खेमे के बारे में सोचा। यह आश्चर्य जनक है कि अरुण शोरी के रहते जेटली को यह पद दे दिया गया। सुष्मा को महिला होने के नाते हो सकता है वह कुछ जस्टीफाई करते मगर मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह और यशवंत सिन्हा के ऊपर उन्हें अिधमान दिया जाना सिर्फ सवाल खड़ा करता है। आडवाणी जी अब राजनीति आपके बस की नहीं बची है, जितने हथकंडे आप जानते थे, आपके चेले उनसे ज्यादा सीख गए और उन्होंने आपके सपने का बंटाधार किया। तभी तो चुनावों के बीच वरुण गांधी को आपका पुराना नकाब पकड़ा दिया गया। आपकी पार्टी में आपका नकाब भले ही चेलों के लिए मूल्यवान हो मगर उस पर पब्लिक को विश्वास नहीं है। यह विश्वास आपने ही कई बार खंडित किया है। पहली बार तब जब आपने अदालत को कहा कि विवादित ढांचा गिरवाने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। तुमने साबित कर दिया कि ढांचे का गिरना एक अपराध था और अपराध से बचने के लिए झूठ सच कुछ भी बोला जाए सब जायज है। पर जो लोग तुम में आस्था रखते थे उनका क्या हुआ। उनकी आस्था के बारे में तुमने नहीं सोचा। इसके बाद वाजपेयी जी के बयान आए, वह उनकी छवि के अनुरूप थे, इसलिए सारा लाभ उन्हीं को मिला, आप हाथ मलते रह गए। आडवाणी जी अब भाजपा को अपने हाल पर छोड़ कर प्रस्थान करो। अब नब्बे के दशक के विचार २०१० में पार्टी का कोई भला नहीं कर सकते। भाजपा के नए नेतृत्व को अपने लिए कोई नई विचारधारा चुनने दो। इसके लिए आप अरुण शोरी, यशवंत सिंह, जसवंत सिंह पर विश्वास कर सकते हो। जेटली और सुष्मा को भी थोड़ा सबल बनने दो, उन्हें सिखाओ की सिर्फ पल्लू पकड़ कर के चलने से कोई अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकता। देश को परिवर्तन के लिए एक वेहतर विकल्प की जरूरत हमेशा रहेगी। यह विकल्प भाजपा ही हो इसके लिए उसे तैयार होना होगा, नही तो नए दल और गठजोड़ जन्मेंगे। जरूरतें इंतजार नही करतीं, खुद के उनके अनरूप बदलना होता है अन्यथा वे तस्वीर ही बदल देती हैं और हो सकता है कि उस तस्वीर में फिर आपके लिए जगह ही नहीं हो।

Wednesday, June 3, 2009

डार्विन से डुन तक, क्या सत्य शीर्षासन करता है?

सुधीर राघव


सत्य भी शीर्षासन करता है? हालांकि यह पूरी तरह सापेक्ष स्थिति है उसके, जिस नजरिये से आप उसे देखते हैं। मौजूदा परिस्थितियों में प्रासंगिक हो गए हैं केविन डुन। यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न सिडनी के इस शोधकर्ता ने १० साल तक आस्ट्रेलियाई समाज का अध्ययन किया है। इस बीच वह १२ हजार ५०० लोगों से मिले। यह अवधि उस समय से दुगनी है, जो चार्ल्स डार्विन ने गैलापागोस द्वीप समूह पर प्रजातियों के अध्ययन में बिताया। डार्विन बीगल पर पांच साल तक सवार रहे। लौटकर अपने साथ क्रमविकास की जो अवधारणा लाए, उससे जीव विग्यान के एक नए युग का सूत्रपात हुआ। जैव विकास का यही सत्य डुन के अध्ययन में शीर्षासन करता नजर आता है। यह समाजशास्त्री बता रहा है कि कैसे किसी समाज में विकास के आधुनिक आवरण में भी पतनोमुखी रुझान दिखता है।


डुन की मानें तो हर १० में से एक आस्ट्रेलियाई नस्लवाद को ठीक मानता है। ये लोग जनजातीय समुदाय और अन्य संस्कृतियों के प्रति घृणा रखते हैं। इनका मानना है कि अन्य समुदायों को आधुनिक आस्ट्रेलियाई संस्कृति का हिस्सा बनने का कोई अधिकार नहीं है। पिछले साल सार्वजनिक किए गए इस अध्ययन में न्यू साउथ वेल्स में नस्लवाद का प्रभाव सबसे ज्यादा बताया गया है। डुन का अध्ययन आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हुए हमलों के माध्यम में देखने पर एक बड़ा प्रतिबिम्ब बनाता है। एक ऐसा बिम्ब जिस पर सिर्फ चिंता जताई जा सकती है और जिसकी भरपूर आलोचना ही की जा सकती है। इसी बिम्ब को अगर पूरे आस्ट्रेलियाई समाज के माध्यम से देखा जाए तो वह कुल आकार का सिर्फ १० फीसदी ही नजर आता है। दूसरे शब्दों में कहें तो नब्बे फीसदी आस्ट्रेलियाई नस्लवाद के किसी भी रूप के विरोधी है। जाहिर है कि महज १० फीसदी लोग किसी समाज की दिशा और मानक तय नहीं कर सकते। ये हमले कर कुछ समय के लिए भय फैलाने का काम तो कर सकते हैं, मगर जिन्हें अपनी योग्यता पर भरोसा है, वे इससे भयभीत होने वाले नहीं। यही वजह है कि इसी महीने अकेले चंडीगढ़ से आस्ट्रेलिया जाने वाले छात्रों की संख्या दो दर्जन से ज्यादा है।


यह दस फीसदी का जोखिम होनहारों की राह की बाधा नहीं बन सकता। इसे भोगपुर निवासी हरमनजोत सिंह के शब्दों में इस तरह कह सकते हैं, यह समय डरने का नहीं करियर बनाने का है। इसलिए सबकुछ जानते हुए भी मैं आस्ट्रेलिया जा रहा हूं।


हरमनजोत ऑटोमोटिव मेकेनिकल टेक्नोलॉजी की पढ़ाई के लिए मेलबर्न जा रहे हैं। उनकी फ्लाइट चार जून को है। उनके हौसले के लिए आप तालियां भी बजा सकते हैं। ऐसे ही हजारों-लाखों भारतीय अपनी योग्यता के बल पर अन्य देशों के विकास में योगदान कर रहे हैं। आईटी और सेवा के क्षेत्र में बारतीयों ने पूरी दुनिया में हमेशा बनी रहेगी। ये योग्य लोग भारतीय होंगे तो भारत भी तरक्की करेगा। योग्यता ही विकास का सत्य है। विश्वास कीजिए सत्य कभी शीर्षासन नहीं करता। यह सिर्फ नजर का फेर है।



( यह लेख आप आज के हिन्दुस्तान, चंडीगढ़ के पुलआउट सोहणी सिटी में भी देख सकते हैं)