Saturday, October 24, 2009

एक गांव का नहीं, पूरे हरियाणे का चौधरी चाहिए

सुधीर राघव
हमारे सरोकार

बात वहीं से शुरू होती है, जहां छोड़ी गई थी। ताऊ का वोट बोला और खूब बोला। किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं। हरियाणा के मतदाता का संदेश साफ है। चौधर का सामंती दौर समापन पर है और लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। ये नतीजे उन लोगों के लिए भी सबक है, जो यह मान बैठे थे कि हरियाणा में विकास सिर्फ उसी क्षेत्र का होता है, जहां का मुख्यमंत्री होता है। सत्ता का उलझा गणित जनता की उस आवाज का भी प्रतीक है जो पूरे राज्य का विकास चाहती है। सिर्फ एक इलाके के दम पर पूरे राज्य का मुख्यमंत्री बनने का सपना आसानी से साकार कर लेना अब पुरानी बात हो चली है।
चुनाव से पहले कांग्रेस के जो नेता हवा में उड़ रहे थे, वह अब जमीन पर हैं। सत्ता के स्वर्ग में जो अपना सिंहासन पक्का मानकर चल रहे थे, उन्हें वोटर त्रिशंकु की तरह बीच में लटका देगा, ऐसी उम्मीद नहीं थी। इनेलो भले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी काफी दूर है, मगर उसकी झोली में इतने वोट तो बरस ही गए हैं कि सत्ता की सूखती बेल में देर सवेर अंकुर फूटने की आशा जाग उठी है। भाजपा और हजकां के बारे में विश्लेषक अब भी यही कहेंगे कि उन्हें किसी के साथ मिलकर ही चुनाव लडऩा चाहिए था। चौपाल पर हुक्का गुडग़ुड़ाते ताऊ का पोस्ट पोल विश्लेषण भी एक लाइन का ही है। हमने एक गांव का नहीं, पूरे हरियाणे का चौधरी चाहिए। अब यो चौधरी आपस में बैठकर फैसला कर लें।
दूसरी ओर वह चैनल वाले हैं, जो चुनाव से पहले कांग्रेस को 70 सीटें दे रहे थे और मतदान के बाद 50, उनका ताजा विश्लेषण फिर काफी लंबा-चौड़ा। उन्हें लगता है कि दर्शकों की यादाश्त काफी कमजोर होती है। इसलिए दावा करने से नहीं चूक रहे कि नतीजे ठीक वैसे हैं, जैसा कि उनके अनुमान लगाया था। लेकिन एक बात साफ है, मैदान में बहुत से दल होने का अर्थ हमेशा बिखरा विपक्ष नहीं होता, इसका अर्थ बहुत से विकल्प भी होता है। हरियाणा की जनता ने यही साबित किया है।

यह लेख २३ नवंबर २००९ को हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में प्रकाशित हुआ

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