Friday, September 11, 2009

स्त्री और मनुस्मृति

मनुस्मृति काल के समाज के बारे में जो कुछ उपलब्ध है, वह बताता है कि वह जाति और वर्ण में बंधे समाज में पुरुष से दोयम होती चली गई। कुछ श्लोक ऐसे भी हैं जिनमें उस शूद्र के साथ बराबरी पर रखते हुए, उस तरह के व्यवहार की बात कही गई है। हालांकि विद्या के मामले में जो श्लोक हैं, उन्हें कई इतिहासविद क्षेपक मानते हैं। इसके अलावा स्त्री के लिए यौन शुचिता का बोझ अलग से बांधा गया, जिसे ढोते-ढोते न जाने कितनी स्त्रियों ने अग्नी-परीक्षा दी। पत्नी का कब-कब त्याग कर पति दूसरी शादी कर सकता है, इससे संबंधित रोचक श्लोक मनुस्मृति में है-
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