Wednesday, August 19, 2009

अपनी ही पार्टी की लंका फुंकी

जसवंत सिंह का कहना है कि पार्टी ने उन्हें एक झटके में हनुमान से रावण बना दिया। सच में वह पार्टी के हनुमान थे। मगर पार्टी वालों में ही रावण के दरबारी और अहंकारी भी थे। वे उनकी पूंछ में तेल में भीगे पलीते लंबे समय से लपेट रहे थे। आडवाणी के बाद कौन के दावेदारों में जो जंग छिड़ी उसमें जसवंत सिंह बहुतों को रास नहीं आ रहे थे। आडवाणी ने जिन्ना की मजार पर जाकर घुटने टेके तो जसवंत ने जिन्ना का अपनी पुस्तक में गुणगान कर बता दिया कि मैं हूं पार्टी का दूसरा आडवाणी। पर उनकी इस किताब ने दियासलाई का काम किया। पूंछ जली तो पार्टी भी सुलगने लगी। यहां तक कि पुराने सहयोगी बाल ठाकरे तक ने पूछ लिया कि आखिर भाजपा वालों का जिन्ना लगता क्या है?
इस सुलगाव को बुझाने के लिए शिमला के ठंडाते मौसम में मंथन किया गया और फिलहाल फैसला किया गया कि इस पूछ को जिसे विरोधी के खेमे में जाकर जलना था, फिलहाल निकालकर बाहर समुद्र में फेंको। जब बुझ जाएगी तब देखा जाएगा। शिमला पहुंचे जसवंत को बैठक में नहीं आने दिया गया। राजनाथ सिंह ने पहले ही फोन कर दिया-भाई तुम पार्टी से निकाल दिए गए हो। अपने पीएम इन वेटिंग लगता है पार्टी का पूरा बंटाधार होने के बाद ही संन्यास लेंगे। आखिर दो सीट से दो सौ के करीब तक ले जाना का कारनामा उन्होंने किया। अब उनके बाद कोई ऐसा कर दिखाएगा तभी तो वह दूसरा आ़डवाणी कहलाएगा। संघ प्रमुख ने भी कह दिया है कि आडवाणी जी अब नई पीढ़ी को नेतृत्व सौंपो।

1 comments:

नरेश सिह राठौङ said...

बहुत सच लिखा है आपने मै आपसे सहमत हू ।