-सुधीर राघव
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं समाज में चार तरह की गुलामी होती है। बल की गुलामी, यह जंगल की रीत है, जिसके पास बल है उसकी इच्छा का अन्य सम्मान करते हैं। उसके अनुसार चलते हैं। धन की गुलामी-यह मनुष्यों ने पैदा की है। धन और निर्वाह के लिए लोग दूसरे की इच्छा के अनुसार चलते हैं। तीसरी है मन की गुलामी- यह कुछ लोग अपने वाकचातुर्य से पैदा करते हैं। यह गुलामी सबसे ज्यादा खतरनाक है। मानसिक गुलामी पूरे समाज को सभी तरह की गुलामियों में धकेल देती है। इस तरह के वाकचातुर्य से भरे लोग सबसे निक्रिष्ट कोटी के होते हैं। वे अपनी जानकारियों के आधार पर अन्य से कहते हैं कि मैं तुम से अधिक जानकार हूं इसलिए है भेड़ बकरियो आओ और मेरी पूजा करो। चरण वंदना करो। मैं तुमसे अधिक श्रेष्ठ हूं।
http://sudhirraghav.blogspot.com/
Friday, August 28, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
0 comments:
Post a Comment