भारत में शब्दों की व्याख्या के ढाई हजार साल पुराना सिद्धांत मौजूद है लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इन्हें इस्तेमाल नहीं किया जाता। यहां तक कि हमारी अदालतें भी इन सिद्धांतों से अनभिज्ञ हैं और तथाकथित शिक्षित लोगों को इनकी जानकारी ही नहीं है। वकील अदालतों में क्रैईस और मैक्सेवेल के व्याख्या सिद्धांतों का उल्लेख तो करते हैं लेकिन मीमांसा सिद्धांतों का कभी जिक्र नहीं करते, शायद उन्होंने इसके बारे में कभी सुना भी नहीं होगा, जबकि ये सिद्धांत ज्यादा सटीक, वैज्ञानिक और तर्कसंगत हैं। यह कहना है सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस मार्कंडेय काटजू का। जस्टिस काटजू इससे पूर्व भी मेरठ के एक मामले में बैलगाड़ी खेती का उपकरण है या नहीं, का फैसला कर चुके हैं। उन्होंने मीमांसा सिद्धांतों का प्रयोग करते हुए स्पष्ट किया था कि बैलगाड़ी फसल और सवारियां ढोने में काम आती है इसलिए इसकी खरीद पर सब्सिडी देना उचित है। उन्होंने कहा कि मैक्सवेल के व्याख्या सिद्धांतों का पहला संस्करण 18६5 में प्रकाशित हुआ था जबकि हमारे यहां ये सिद्धांत ढाई हजार वर्षों से मौजूद हैं। उदाहरण के तौर पर कहा जाता है कि 'न कलंजं भक्ष्येते यानी बासी खाना मत खाओ। यही भूमि अधिग्रहण एक्ट की धारा 6 में कहा गया है। इसमें स्पष्ट मनाही है कि समय सीमा बीतने के बाद भू-अधिग्रहण की सूचना प्रकाशित नहीं की जाएगी। जब कानून में स्पष्ट मनाही है तो उसकी व्याख्या कर इसे हां में कैसे बदला जा सकता है। सौ वर्ष पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सर जॉन एज ने बेनीप्रसाद बनाम हरदेयी बाई (१७८2) के केस में इन सिद्धांतों का प्रयोग किया इसके बाद मार्कंडेय काटजू ने इनका प्रयोग किया लेकिन फिर इन सिद्धांतों का इस्तेमाल नहीं हुआ है। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में जैमिनी ने अपने मीमांसा सूत्र बनाए और इनकी सबर , कुमारिल भट्ट, प्रभाकर और मंडन मिश्रा ने व्याख्या की। इन सूत्रों को प्रख्यात न्यायविद विज्ञानेश्वर(उत्तर और दक्षिण भारत में लागू हिन्दू लॉ मिताक्षर के लेखक), जिमुत्वहन (बंगाल में लागू हिन्दू लॉ दयाभाग के लेखक), नंदा पंडित (दत्तक मीमांसा लेखक) ने प्रयोग किया है। जब भी मनुस्मृत्ति तथा यज्ञवल्क्य स्मृति में टकराव होता था इन सूत्रों का इस्तेमाल कर इसे दूर कर लिया जाता था।
(दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित जस्टिस मार्कंडेय काटजू के व्याख्यान से)
Saturday, August 22, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
0 comments:
Post a Comment