पिछले कुछ वर्षों से हिन्दू त्योहारों को लेकर एक अजब सी भ्रम की स्थिति पैदा कर दी जाती है। कमोवेश हर त्योहार को लेकर दो तिथियां बताई जाती हैं। इस बार जन्माष्टमी पर भी कुछ मंदिरों में वीरवार को ही मना ली गई जबकि कुछ शुक्रवार को मना रहे हैं। वाकायदा दोनों तिथियों का प्रचार किया जाता है। पुजारियों से पूछा जाए तो उनके अपने तर्क होते हैं। उनका कहना है कि वैष्णव और शैव के लिए अलग-अलग दिन यह त्योहार होता है। कुछ बताते हैं कि यह पंचांग की गड़बड़ है। देश में कई तरह के हिन्दू पंचांग चलते हैं। इनमें से कुछ चंद्र तिथि के अनुरूप ही त्योहार को मानते हैं, जबकि कुछ सूर्योदय के समय जो तिथि होती है उससे आकलन करते हैं। जैसे अष्टमी तिथि वीरवार दोपहर बाद से शुरु हुई और शुक्रवार दोपहर तक थी तो कुछ ने इसे वीरवार को ही माना जबकि सूर्योदय से आकलन करने वालों का तर्क था कि सूर्योदय के समय वीरवार को सप्तमी थी और शुक्रवार को अष्टमी इसलिए इसे शुक्रवार को मनाना चाहिए।
पुजारी और अलग-अलग पंचांग। जहिर है आम आदमी में भ्रम ही पैदा करते हैं। अब सक्रीय मीडिया के दौर में दोनों तरह की जानकारियां तेजी से प्रसारित होती हैं और श्रद्धालु और भ्रमित होते। एक साधारण हिन्दू सभी देवी देवताओं का समान उपासक है। वह यह भी नहीं जान पाता है कि वह शैव है या वैष्णव। ऐसे में विद्वानों और शंकराचार्यों को कोई सर्वसम्मत हल निकालना चाहिए।
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