Saturday, July 25, 2009

सांप की तरह अपने ही अंडे खा रही हैं खाप पंचायतें

-सुधीर राघव
सभी जीव अपनी संतती की रक्षा करते हैं और वृद्धि करते हैं। अपनी ही संतानों की हत्या के षड्यंत्र रचने के किस्से बहुत कम मिलते हैं। सौतेली संतानों के लिए ऐसा करने के बहुत उदाहरण होंगे। हां संतानों द्वारा बड़ों की हत्या कर सत्ता कब्जा लेने के भी बहुत उदाहरण हैं। जीव हमेशा अपनी वंश वृद्धि करते हैं और शत्रुओं का हनन करते हैं। हरियाणा की खाप पंचायतें जिनका मूल आधार ही गोत्र और वंश हैं, वे सांप की तरह अपने ही अंडे खा रहे हैं। ऐसे में कहां वे गोत्रों के विकास और रक्षा की बात कर रहे हैं। वह कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाकर ऐसा कर रही हैं।
इस संबंध में ग्रामीणों और संबंधित समुदायों को जागरूक करने के लिए क्या अभियान नहीं चलाया जाना चाहिए। यह सवाल मैंने हरियाणा के दो प्रमुख लोगों से पूछा, पहले थे अखिल भारतीय जाट महासभा के अध्यक्ष पवनजीत सिंह। वह झज्जर और सिंहवाल की घटना पर पहले तो सफाई देते से नजर आए। उनका कहना था कि पंचायतें ऐसा नहीं करती हैं, बात जब परंपराओं के खिलाफ जाती है तो लोग आवेश में आकर कदम उठाते हैं। वेदपाल की हत्या भी आवेश में की गई। जब उनसे यह पूछा गया कि जब पंचायतों की नाराजगी के बाद अपने ही गोत्र के बच्चे मारे जा रहे हैं तो क्या इस संबंध में पूरे प्रदेश में किसी अभियान की जरूरत महसूस नहीं हो रही है। ऐसे कौनसे कारक हैं जो ऐसे परिस्थितयां खड़ी कर रहे हैं और उनके समाधान के रास्ते निकाले जाने चाहिए। उनका कहना था कि हां अभियान की जरूरत हैं। हम लोग बैठकर विचार करेंगे।
यही सवाल आर्यसमाज के स्वामि अग्निवेश जी से किया गया तो उनका कहना था कि समाज दो जन्मना जातिवाद के खिलाफ दो सदी से मुहिम चलाए हुए है। अग्निवेश जी सुधारक और विचारक की छवि रखते हैं तथा मंदिरों के बहाने हो रहे अवैध कब्जों के खिलाफ मुहिम पर जोर देकर एक और अच्छी पहल की है। ऐसे में खाप-पंचायतों द्वारा कानून व्यवस्था के लिए खड़ी की जा रही समस्या के प्रति मुहिम खड़ी कर पाना खुद खाप से जुड़े लोगों द्वारा ही संभव है। अगर बाहरी लोग इस दिशा में कुछ करेंगे तो जाहिर है विवाद बढ़ेंगे, लेकिन समुदाय के पढ़े-लिखे लोगों को खापों की मनमानी के खिलाफ आगे आना चाहिए। अपने ही बच्चों को मार कर आप कोई भला संदेश नहीं दे रहे हैं, युवा खून विद्रोही होता है, पंचायतों पर हुक्का गुड़गुड़ाते बुढ़ाते लोग अगर समझते हैं कि उनके कठोर फैसले प्रेम विवाहों को रोक सकते हैं तो वे गलती पर हैं, ऐसे मामले और बढ़ेगे। समझदारी इसी में है कि बच्चों को सही संस्कार दें। डंडे के जोर पर काम करोगे तो तालिबान कहलाओगे या फिर जंगली। क्योंकि जंगल में ही लाठी अकल से बड़ी होती है।

0 comments: