सुधीर राघव चंडीगढ़
माना जाता है कि समाज अपने आघात से सीखता है, मगर हरियाणा में आकर ऐसी मान्यताएं अक्सर खापों के कठोर फैसलों के आगे टूटती दिखती हैं। गोत्र के दायरे से बाहर जाकर विवाह और प्रेम विवाह करने वालों के खिलाफ मौत तक के फरमान बदस्तूर जारी होते हैं। इसके बावजूद ऐसे विवाह हो रहे हैं और फरमान भी उसी गति से जारी हो रहे हैं। शादी ही नहीं, कई बार बच्चा होने के बाद भी दंपति को भाई-बहन बनने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। इस तरह के फरमान सुनने में पूरी तरह तुगलकी और तालिबानी लगते हैं। इसके बावजूद हरियाणा का कोई कद्दावर नेता या पुलिस अधिकारी इस खापतंत्र के खिलाफ जुबान खोलने को राजी नहीं। इस संबंध में खापों के अपने तर्क हैं। वह यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि इसकी वजह पंचायतों के अपने अधिकारों से आगे जाकर फैसला करना है। उनका मानना है कि नियमों में ही कुछ खोट है। अखिल भारतीय जाट महासभा के अधक्ष पवनजीत सिंह का कहना है कि हिन्दू विवाह अधिनियम हमारे समाज के अनुरूप नहीं है। कानूनी तौर पर ऐसी शादियों को मंजूरी दे दी जाती है, जिनमें लड़का-लड़की को हमारी संस्कृति के अनुसार भाई-बहन माना जाता है। ऐसे में टकराव तो होता रहेगा। लोग भले ही इन्हें तुगलकी और तालिबानी फरमान कहें, मगर हमारी जड़ों और जरूरतों को समझते हुए प्रावधान किया जाना चाहिए और हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन होना चाहिए। जब तक यह नहीं होगा, ऐसे टकराव होते रहेंगे। परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं, वे किसी एक के लिए नहीं टूट सकतीं। आर्य समाज के स्वामि अग्निवेश सिंहवाला की घटना को सरकार की नाकामी के रूप में देखते हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई नागरिक हाईकोर्ट से आदेश लेकर भी सुरक्षित नहीं है तो इसका मतलब है कि सरकार कमजोर है। वह कानून व्यवस्था को लागू करवापाने में नाकाम है। सरकार को सामंती ताकतों के आगे नहीं झुकना चाहिए। आर्य समाज हमेशा से ही जन्मना-जातिवाद व्यवस्था के खिलाफ रहा है। आर्य समाज के मंदिरों में देशभर में प्रतिदिन ७०० से ८०० शादियां होती हैं और इनका आधार जाति नहीं होता। साथी चुनने का अधिकार हर युवक-युवती को है। परिवारवालों को उसका समर्थन करना चाहिए। वह कहते हैं कि स्वामि दयानंद के ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि स्वंयवर प्रथा जबतक हमारे समाज में रही, आर्यवर्त ऊंचाइयों तक गया और जब से यह समाप्त हुई हमारा पतन शुरू हो गया। समाज में युवा जोड़ों के प्रेम के प्रति सामंती नजरिया कई बार बदले की भावना से भी प्रेरित होता है। ऐसा लगता है कि हीर रांझा के किस्से सुनकर यहां किसी वारिस शाह की आंखें नहीं भीगती। हरियाणवी फिल्म चंद्रावल भी दुखांत प्रेम कहानी पर आधारित फिल्म थी, जो यहां सुपर हिट रही। जो किस्से हमारा मनोरंजन करते हैं, वे क्या हमें सबक नहीं देते। वेदपाल जैसा हर किस्सा अपने पीछे सबक छोड़ जाता है, असर आएगा मगर धीर-धीरे।
(जैसा कि हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के शुक्रवार के अंक में प्रकाशित)
Friday, July 24, 2009
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