Friday, July 24, 2009

मृत्यु है आनंददायक

-ओम राघव
रहें तन से मन से स्वस्थ्य
वही जीना सुंदर है
रहें रोगी तन से मन से
वह जीना ही असुंदर है
स्वस्थ रहें जब तक दुनिया में
जीने का वास्तविक अर्थ है
थकें हाथ-पैर उंगलियां शरीर की
औरों के सहारे का जीवन ही व्यर्थ है।
जिएं जितने वर्ष दुनिया में
उसका क्या मूल्य है
समाज हित किए कर्म जिसने
वही जीवन अमूल है
रोगी तन-मन कर्ज समाज का
बनी केवल भार इस भूमि का
विश्व में पल रहे अनेक जीव
जीना उसका भी यथा एक कृमि का
गर मौत आ गई शोक-मलाल कैसा?
न कभी जीव और न मन मरे
मरण केवल मानव शरीर का
छोड़ना जब कभी यह तन पड़े
मृत्यु है आनंददायक
डूब आकंठ जीव स्नान करे जिसमें
जीवन के श्रम की होती थकान दूर
नए वस्त्र जीव पहन नव-द्वार चल पड़े
स्वागत है आए मौत उसका,
चल पड़ मेहमान की तर्ज पर
आया जो रहता कुछ देर-दिन
चला जाता लौट निज द्वार जिस तरह।।
साभार - dadajikablog.blogspot.com

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