Tuesday, July 7, 2009

यह कैसा बजट

-सुधीर राघव
लंबे समय बाद दीर्घकालिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बना बजट सामने आया है। इसमें लोकप्रिय फैसले लेने से बचा गया है। यह जरूरी नहीं है कि लोकप्रिय फैसले व्यवस्था के लिए फायदेमंद हों? वित्तमंत्री चाहते तो आयकर सीमा में छूट दो लाख तक कर और उद्योगों के लिए पैकेज की घोषणा कर आसानी से वाहवाही लूट सकते थे। ऐसा नहीं किया गया। बजट में व्यवस्था उन लोगों को लिए की गई, जिन्हें शायद इस बात ठीक-ठीक अंदाजा भी नहीं हो पाएगा कि उनके लिए क्या-क्या किया गया है। यह तो था जनदृष्टि से बजट का आकलन। लोगों के लिए इसमें बहुत खुश होने के लिए कुछ नहीं है। यही बजह भी रही की बजट भाषण सुन शेयर बाजार धड़ाम हुआ।अब जाने की अर्थशास्त्र क्या कहता है। देश के तीव्र विकास के लिए ऊंची विकासदर जरूरी है। जाहिर है देश का सकल उत्पादन जिस गति से बढ़ेगा, उसी गति से रोजगार बढ़ेंगे, लोगों की आया बढ़ेगी, आय बढ़ने से क्रयशक्ति बढ़ेगी, जाहिर मांग बढ़ेगी और निवेश का माहौल बनेगा। अभी तक जो छह से आठ फीसदी की विकासदर के बीच हम पिछले दस साल से चल रहे हैं, वह हमें महानगरों और उनके आसपास के छोटे शहरों और कस्बों में हुए विकास की बदोलत है। यहां ढांचागत व्यवस्था में निवेश हुआ, जमीनों के भाव बढ़े, लोगों को रोजगार मिले और इतनी ज्यादा दोहन हो गया कि यहां और निवेश की सीधी गुंजाइश नहीं थी और ज्यादा निवेश वहां सिर्फ चीजों के दाम बढ़ाने वाल ही हो गया यानी सीधे-सीधे इनफ्लेशन। इसे हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं। दिल्ली और गुड़गांव के आसपास के किसी भी इलाके में आज से दस साल पहले जमीन के रेट देखे। तब जो निवेश हुआ, उसने वहां नए संसाधन खड़े किए और वहां की बेरोजगार पड़ी या कम उत्पादकता दे रही जमीन और लोगों को उपयोगी बना दिया। अब वहां और निवेश का मतलब है कि निवेशक को जमीन खरीदने के लिए बहुत बड़ी प्रतियोगिता का सामना करना होगा और कीमत काफी ऊंची होती जाएगी। इसके अलावा उसके उत्पादन के खरीददार भी कम होंगे क्योंकि वहां उसे प्रतियोगियों का सामना करना पड़ेगा, और इस तरह एक मंदी की स्थिति उसे अपने काम में झेलनी होगी। इसके विपरीत दूर-दराज के इलाकों में अब भी जमीन और लोग अनुपयोगी और बेरोजगार हैं। वहां कोई निवेश करने को राजी नहीं है। वजह, वहां लोगों के पास क्रय शक्ति नहीं है। जिनके पास है, उनकी संख्या इतनी कम है कि उन्हें अपनी खऱीददारी के लिए शहर आना पड़ता है और चीजें उनके पास नहीं पहुंचतीं। इन लोगों की अगर क्रयशक्ति बढ़ती है तो जाहिर है कि निजी निवेशक और उद्यमी वहां भी पहुंचने लगेंगे। शुरू में कोई निवेशक वहां धन नहीं लगा सकता, क्योंकि यह घाटे का सौदा है और धन लगाने के बाद लंबा इंतजार करना होगा। इसलिए यह पहल सरकार को करनी होगी। इस बजट में सरकार ने वही पहल की है। ग्रामीण और मजदूरों और किसानों के लिए बनी योजना कोई समाजवादी फलसफा नहीं है, यह ठेठ पूंजीवादी जरूरत है। अगर पूंजी का प्रसार इन पिछड़े इलाकों की ओर नहीं होता है तो भारत भी लंबी मंदी के भंवर में उसी तरह से फंस सकता है, जैसे पश्चिमी देश, जिनके पास अब विकास के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है। हो सकता है इसके लिए वे अफ्रीकी देशों का रुख करना चाहें, मगर इसके लिए अगर अफ्रीकी देशों के सरकारें उदार होती हैं और इन कंपनियों को धन लगाने की इजाजत देती हैं तो वे इनपर उपकार ही करेंगी। साथ ही भूख और गरीबी से लड़ रहे लोगों की मदद होगी इसलिए यह मानवता से भी उपकार होगा। हमारे देश में एक साथ रवांडा और न्यूयॉर्क बसता है। इसलिए हमें प्रयोग करने के लिए अपने ही देश में काफी गुंजाइश है। इस तरह से प्रणब का बजट अर्थशास्त्र की किताब के मुताबिक बिल्कुल समय के अनुकूल है। इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। अगर किसी अर्थशास्त्री को प्रणव को बजट पर नंबर देने हों तो वह सौ में से नब्बे से ज्यादा ही देगा। यही वजह है कि उद्योगों को कुछ खास न मिलने के बाद भी फिक्की के अध्यक्ष या किसी भी बड़े औद्योगिक संगठन ने बजट की आलोचना नहीं की है। असल में दूरदराज के इलाकों के लिए बिजली, सड़क और मूलभूत सुविधाओं का फंड बढ़ाकर और उनके लिए रोजगार के नरेगा जैसी योजनाओं में अस्सी फीसदी की बढ़ोतरी कर परोक्ष रूप से उद्योगों को ही नई जमीन देने की तैयारी की गई है। अगर योजनाएं सफल हुईं तो उद्योगपति पांच साल बाद उन दूरदराज के इलाकों में उद्योग लगाना पसंद करेंगे, जहां बिजली, पानी और सड़क हो। वहां जमीन और मजदूर तो पहले ही काफी सस्ता होगा। अगर ऐसा होता है विकास दर दो अंकों में आसानी से पहुंच सकती है।
सबसे बड़ी बाधा पर ऐसा होने में सबसे बड़ी बाधा हमारा चरित्र है। सरकारी योजनाओं के बारे में राजीव गांधी खुद कहते रहे हैं कि अगर १ रुपया चलता है तो पांच पैसे भी नहीं पहुंचते। अगर यह पैसा गांव के लोगों तक पहुंच पाता है तो तस्वीर बदलेगी, इसमें शक नहीं। वर्ना लालफीताशाही और भ्रष्टाचार और बढ़ेगा है। एक तरह से विधानपालिका ने अपना काम कर दिया है। अब लोकतंत्र के अन्य स्तंभों को इस दिशा में काम करने की जरूरत है। कार्यपालिका में सबसे ज्यादा गड़बड़ होती है। ऐसे में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया को एक बार फिर अपनी चौकस निगाहें रखनी होंगी। इसके लिए मिडिया को भी अब गांवों और कस्बों का रुख करना होगा। अब अगल दशक का नारा यही है, चलो गांव की ओर।

0 comments: