Saturday, June 20, 2009

गलतफहमी

-सुधीर राघव

कविता सिर्फ कल्पना नहीं होती

कविता कोरा सच भी नहीं होती

कविता नाजुक मन का धर्म है

यह मान लेना भी एक भ्रम है

कविता कल-कल करती नदी है

या ऊंघती-जागती कोई सदी है

कविता सुरों पर साधे राग हैं

या रसबेरियों के लदे बाग हैं

कविता कोई दबी सी आग है

या आकाश का टूटा भाग है

कविता जल का तीव्र आवेग है

या पवन का झूमता सा वेग है

कविता सिर्फ जमीं नहीं होती

कविता सिर्फ जल नहीं होती

कविता सिर्फ वायु नहीं होती

कविता सिर्फ आकाश नहीं होती

कविता सिर्फ अग्नि नहीं होती

कविता कवि की गलतफहमी भी होती है।

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