Monday, June 29, 2009

वर्षा

रिमझिम रिमझिम आती वर्षा
जीवन का राग सुनाती वर्षा
धूप तपी सूखी फसलों में,
फिर से जीवन लाती वर्षा।
गर्म रेत जब जलने लगता
तन से पानी चलने लगता
मांझी नाव किनारे रखता.
ऐसे में चुपके से आकर,
मेरी कागज की किश्ती को
बिन पतवार चलाती वर्षा।
गर्मी सताए नर-वानर को
और छोड़ वह अपने घर को
ताकने लगता जब अंबर को
ऐसे में चुपके से आकर
धूप तपे काले बदनों को
ठंडी राहत लाती वर्षा।
लगे कूकने कोयल वन में
मोर नाचने लगे उपवन में
उठने लगें हिलोरें मन में
ऐसे ही चुपके से आकर
रेतीले रेगिस्तानों में
नखलिस्तान बनाती वर्षा।।
-सुधीर राघव

(सुधीर राघव की अन्य कविताएं आप http://sudhirraghav.blogspot.com/ पर देख सकते हैं)

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