-सुधीर राघव
काव्यांजलि चंडीगढ़ साहित्य अकादमी का एक अनूठा प्रयास है। एक ही संकलन में चंडीगढ़ और आसपास के ८९ कवियों को रखा गया है। इस तरह एक बेहद जटिल काम संपन्न किया गया है। इसके बावजूद संकलन संग्रहणीय है,.क्योंकि यह क्षेत्र की प्रतिभा संपदा से परिचय करवाता है। इसमें कुछ स्थापित साहित्यकार हैं तो साहित्य की पगडंडियों के नए पथिक भी। काव्यांजलि के कवि के लिए अगर आप कोई एक चेहरा तलाशें तो नहीं ढूंढ पाएंगे। इसलिए समीक्षाकर्म भी कठिन है। एक ही जगह इतनी विभिन्नता जुटा लेने के लिए डॉ. धर्मस्वरूप गुप्त और उनका संपादक मंडल बधाई का पात्र है। संकलन में कई ऐसे नाम हैं, जो आकर्षण जगाते हैं, कुछ नए बिम्ब भी हैं, जो ताजगी का एहसास करता हैं। सुनील प्रभाकर की कविता -मैं कहां हूं- में इसकी बानगी देखिए-
आज़ादी के दरख्त पर
एक भी हरी पत्ती नहीं
जिससे गरीब आदमी की
मरी उम्मीदों को ढंका जा सके
उर्मिल सखि की कविता में भी ऐसे ही बिम्ब नजर आते हैं। इसके
इलावा जयश्री की कविता में छायावाद, बलवीर संधु में प्रगतिवाद और योजना रावत में आप नई कविता तलाश सकते हैं। इस तरह इस संकलन की कविताएं एक समयकाल की होकर भी अलग-अलग प्रथाओं का अनुसरण करती हैं। कुल मिलाकर इस काव्य संकलन में आपको काव्य की अनेक धाराएं एक साथ बहती दिखाई देंगी। जब बहुत सी धाराएं एक ही जगह गिरती हैं तो सागर बनता है। संभव है सभी धाराओं का स्वाद मीठा हो मगर सागर का स्वाद इससे इतर होता है। उसका अपना स्वाद होता है। यही अलग स्वाद आपको इस संकलन में भी मिलेगा।
(यह समक्षा आप हिन्दुस्तान के २८ जून २००९ के अंक में कलम पृष्ठ पर भी पढ़ सकते हैं)
Sunday, June 28, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
0 comments:
Post a Comment