अस्सी और नब्बे का दशक देश में नफरत फैलाने का दौर था। इस दौर में जितने भी कुकरमुत्ते नेता पैदा हुए, उतने किसी और दौर में नहीं। धर्म के नाम पर जाति के नाम पर, संप्रदाय के नाम पर, जिसने जितनी नफरत फैलाई वह उतना ही बड़ा नेता बना। राम जाने ये लोग किससे प्रेरित थे। खेर नई सदी आई, लोग जागे और इन बड़े नेताओं को हांसिए पर धकेलने का काम शुरू हुआ। उत्तर प्रदेश की ज्यादा आबादी में अशिक्षा और रूढ़ियों की दलदल में ऐसे नेता खूब पनपे। महात्मा गांधी को ऐसे नेता गाली देना अपना धर्म समझते हैं। इनकी बातों में आपको सिर्फ नफरत ही मिलेगी। जहां नफरत हो, वहां गांधी को गाली ही मिलेगी।
स्वर्गीय कांशीराम अपने गृह राज्य पंजाब में कोई बहुत प्रभावशाली संगठन खड़ा नहीं कर पाए। वहां, जब-जब बसपा मतबूत हुई, वह तब-तब ही टूटी। दूसरी और यूपी में मायावती के साथ मिलकर वह भी हिट हो गए। आडवाणी भी यूपी में ही हिट हुए। मोदी और वरुण को भी यहां खूब सम्मान मिला। नफरत की राजनीति में रुचि दिखाने का खामियाजा ही उत्तर प्रदेश ने भुगता है और हर मोचर्चे पर यह प्रदेश लगातार पिछड़ता रहा। अब उसे ऐसे ही नेता मिल रहे हैं। मुलायाम हो, मायावती हो या कल्याण सिंह, सबकी बोली और शैली कमोवेश एक जैसी ही है।
पर अब लगता है कुछ सुधार आ रहा है। भले ही माया और मुलायम न सुधरें, पर पिछला लोकसभा चुनाव गवाह है कि लोग सुधर रहे हैं।
Saturday, June 20, 2009
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