Wednesday, June 17, 2009

ओबामा का नेहरू मॉडल

सुधीर राघव

साम्यवाद की अवधारणा की साख टूटे अभी दो दशक गुजरे हैं, पूंजीवाद का डंका बजा रहे बाजार की जड़ें इस मंदी में बुरी तरह से हिल गई हैं। मुक्त बाजार के समर्थक अब नकेल की बात कर रहे हैं। अमेरिका भी अब अर्थतंत्र का नेहरू मॉडल अपनाने जा रहा है, जिसे लालफीताशाही कहकर बाहर ही नहीं अपने देश में भी गरिया जाता रहा है। बराक ओबामा ने बड़े वित्तीय सुधारों की घोषणा की है। इसके तहत बैंकिंग प्रणाली पर निगरानी और नियंत्रण के लिए अलग से विभाग भी बनेंगे।
असल में नेहरू अपने समय की दो सबसे लोकप्रिय धाराओं साम्यवाद और पूंजीवाद से अलग अवधारणा पर चले। वह मानते थे कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं है, इसलिए वह ऐसे काम निजी क्षेत्र के हाथों में ही रखना चाहते थे, पर इस सोच के बावजूद वह पूंजीवादी नहीं हो पाए, उनका मानना था कि गरीब भारत में पिछड़े क्षेत्रों में संसाधन खड़े करने का जोखिम कोई उद्योगपति नहीं लेगा अतः इन क्षेत्रों में सरकार को पहल करनी होगी, तथा व्यापक जन प्रभाव वाले क्षेत्र भी सरकार की देखरेख में होने चाहिए। संभवतः नेहरू ने उस समय की दोनों विश्वशक्तियों के बीच सामंजस्य बैठाते हुए एक मजबूत राष्ट्र तैयार करने के लिए यह मॉडल अपनाया हो मगर इस मंदी ने मुक्त बाजार के समर्थकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वित्तीय सेक्टर को खुले सांड की तरह नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि यह सिर्फ उत्पादन ही नहीं बढ़ाता बल्कि विनाश भी कर सकता है। इस क्षेत्र की गलतियां सबको भुगतनी पड़ती हैं। उनके असर से कोई नहीं बच सकता। इसलिए जरूरी है कि इस सांड को खूंटे का बैल बनाया जाए।
हालांकि कार्ल मार्क्स वर्ग संघर्ष के वजह से पूंजीवाद का अंत मानते हैं, मगर मौजूदा परिस्थितियों को देखकर लगता है कि नेहरू मॉर्क्स से ज्यादा दूरदृष्टा साबित हुए। न तो पूंजी का महत्व कम होने वाला है और न ही समाज का। असली रास्ता इन दोनों के बीच से होकर जाता है। इनके बीच का संतुलन ही सबसे बड़ा सिद्धांत है। इसलिए मार्क्स और कैंजे दोनों से कम गुणाभाग करने के बावजूद नेहरू अधिक व्यवहारिक आर्थिक अवधारणा अपने पीछे छोड़ गए हैं।

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