Monday, November 9, 2009

यादों की जीरोक्स

यारों संग बैठ के
उस चाय के खोखे पे
हाथ में कप और होठों पर चुगलियां
कौन-सी लड़की कौन-सा लड़का
कब, कैसे, क्या, कहां????
बैठना लाइब्रेरी के बाहर
गप्प हांकना

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Saturday, October 24, 2009

एक गांव का नहीं, पूरे हरियाणे का चौधरी चाहिए

सुधीर राघव
हमारे सरोकार

बात वहीं से शुरू होती है, जहां छोड़ी गई थी। ताऊ का वोट बोला और खूब बोला। किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं। हरियाणा के मतदाता का संदेश साफ है। चौधर का सामंती दौर समापन पर है और लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। ये नतीजे उन लोगों के लिए भी सबक है, जो यह मान बैठे थे कि हरियाणा में विकास सिर्फ उसी क्षेत्र का होता है, जहां का मुख्यमंत्री होता है। सत्ता का उलझा गणित जनता की उस आवाज का भी प्रतीक है जो पूरे राज्य का विकास चाहती है। सिर्फ एक इलाके के दम पर पूरे राज्य का मुख्यमंत्री बनने का सपना आसानी से साकार कर लेना अब पुरानी बात हो चली है।
चुनाव से पहले कांग्रेस के जो नेता हवा में उड़ रहे थे, वह अब जमीन पर हैं। सत्ता के स्वर्ग में जो अपना सिंहासन पक्का मानकर चल रहे थे, उन्हें वोटर त्रिशंकु की तरह बीच में लटका देगा, ऐसी उम्मीद नहीं थी। इनेलो भले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी काफी दूर है, मगर उसकी झोली में इतने वोट तो बरस ही गए हैं कि सत्ता की सूखती बेल में देर सवेर अंकुर फूटने की आशा जाग उठी है। भाजपा और हजकां के बारे में विश्लेषक अब भी यही कहेंगे कि उन्हें किसी के साथ मिलकर ही चुनाव लडऩा चाहिए था। चौपाल पर हुक्का गुडग़ुड़ाते ताऊ का पोस्ट पोल विश्लेषण भी एक लाइन का ही है। हमने एक गांव का नहीं, पूरे हरियाणे का चौधरी चाहिए। अब यो चौधरी आपस में बैठकर फैसला कर लें।
दूसरी ओर वह चैनल वाले हैं, जो चुनाव से पहले कांग्रेस को 70 सीटें दे रहे थे और मतदान के बाद 50, उनका ताजा विश्लेषण फिर काफी लंबा-चौड़ा। उन्हें लगता है कि दर्शकों की यादाश्त काफी कमजोर होती है। इसलिए दावा करने से नहीं चूक रहे कि नतीजे ठीक वैसे हैं, जैसा कि उनके अनुमान लगाया था। लेकिन एक बात साफ है, मैदान में बहुत से दल होने का अर्थ हमेशा बिखरा विपक्ष नहीं होता, इसका अर्थ बहुत से विकल्प भी होता है। हरियाणा की जनता ने यही साबित किया है।

यह लेख २३ नवंबर २००९ को हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में प्रकाशित हुआ

Wednesday, October 14, 2009

ताऊ चुप सै तो के, उसका वोट तो बोलैगा

सुधीर राघव

हमारे सरोकार

देख रे भाई! वोटर ने तो मधानी घुमा दी। अब मक्खन का पेड़ा किसके हाथ आवैगा यो जानणा सै तो सब्र कर। चौपाल पर हुक्का गुडग़ुड़ाते ताऊ का हरियाणा चुनाव के बारे में यह एक लाइन का विश्लेषण है। लेकिन उसकी एक पंक्ति में छिपे भावार्थ काफी कुछ कहते हैं।
पिछले एक साल में बहुत कुछ बदला है। नई सदी के वोटर की नब्ज जानने में मीडिया के पसीने छूट जाते हैं। पिछले चुनाव के नतीजे गवाह हैं कि सारी आंकड़ेबाजी धरी रह गई। नब्बे के दशक में देश में मंडल-कमंडल की हवा बही और साथ ही बहा वोटर भी। देखते-देखते सेफोलोजिस्ट की सेना खड़ी हो गई। पत्रकार ज्योतिषियों से नजर आने लगे। चुनाव होने से पहले सबके पास भविष्यवाणी थी कि कौन सा दल कितनी सीटें ला रहा है। सबके पास थोड़े-बहुत अंतर से कमोबेश एक-जैसे आंकड़े होते थे और नतीजे आने पर दो-चार के अंतर से सभी की भविष्यवाणियां करीब-करीब सही निकलती थीं। हालत यह थी कि आम मतदाता भी पत्रकारों से पूछता कि किस दल की कितनी सीटें आ रही हैं और जवाब मिलने पर खुशी से ताली पीटता कि उसका भी अंदाजा यही है। हवा अपनी दिशा खुद बताती है। इसे बूझ लेने का भ्रम पाल कर एक आसान खुशी सबको मिल रही थी।
पर पानी जितना शांत होता है, उतना ही गहरा भी होता है। इसमें बहुत से अनुमान डूब जाते हैं। नई सदी का वोटर ऐसा ही शांत पानी है। देश को आठ फीसदी की ग्रोथ देने वाले नागरिक किसी हवा में बहक सकते हैं, ऐसा सोचने वाले भी दुस्साहसी हैं। वर्ष 2००२ के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने जब सारे पूर्वानुमान धराशायी करते हुए फीलगुड को फुस्स किया तो मीडिया के पंडितों की आंखें भी खुली की खुली रह गई थीं।
2०9 में वोटर ने फिर चौंकाया। इसके बावजूद आंकड़ेबाजी जारी है। विधानसभा चुनाव में किस दल को कितनी सीटें मिल रही हैं, चुनाव पूर्व और मतदान के बाद, दोनों तरह के आंकड़े चैनलों पर चल चुके हैं। पहले अलग-अलग चैनलों में दो चार का अंतर होता था, अब हालत यह है कि एक ही चैनल के दो बार के आंकड़ों में दस-बीस का अंतर दिख रहा है। पहले जो किसी दल को 6 से 7 सीटें दे रहे थे, मतदान के बाद के विश्लेषण में 5 के करीब दे रहे हैं।
हरियाणा में इस बार पांच प्रमुख दल अलग-अलग ताल ठोक रहे हैं। इसलिए नतीजे आने के बाद का विश्लेषण भी तैयार हैं। एक चैनल का पत्रकार साथी सुझा रहा है, हारने वालों के लिए बिखरा विपक्ष सबसे बड़ा कारण बताया जा सकता है, जो जीतेगा वह सबसे बेहतर विकल्प कहलाएगा। इस विश्लेषण पर जब ताऊ की राय ली तो फिर वही जवाब था-बेटा सब्र कर।
संकेत साफ हैं, अब ताऊ नहीं उसका वोट ही बोलेगा। पत्रकार को वोटर की नब्ज जाननी है तो उसे भविष्यणियों का खेल छोड़कर लोगों के बीच निकलना होगा यह जानने के लिए कि कहां-कितना विकास हुआ है।

१४ अक्तूबर को दैनिक हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में प्रकाशित

Monday, October 12, 2009

चंडीगढ़ : परियोजनाओं में घपलेबाजी

यूटी के बड़े प्रोजेक्ट्स की स्पेशल ऑडिट में गृह मंत्रालय को भारी धांधलियां मिली हैं। राजीव गांधी चंडीगढ़ टेक्नोलॉजी पार्क में आईटी कंपनियों को जमीन देने में घपला किया गया है। अलॉटमेंट मनमाने ढंग से की गई है। स्पेशल ऑडिट गृहमंत्रालय ने इस साल जून में किया था। इसकी रिपोर्ट हाल ही में गृह मंत्रालय में जमा कराई गई है।
रिपोर्ट के अनुसार किसानों को बढ़ते कोर्ट केसों और नेशनल रिहेबिलिटेशन एंड रिसेटलमेंट पॉलिसी के तहत ज्यादा मुआवजा दिया जाना चाहिए। स्पेशल ऑडिट में यह भी सामने आया है कि पाश्र्वनाथ से मिले रुपयों को भी जमा कराने में लापरवाही बरती गई है। सरकारी खजाने में जमा कराने की बजाए इसे सीएचबी और प्रशासन के संयुक्त खाते में जमा कराया गया। यह गलत है। इसके अलावा कम कीमत पर जमीन का प्रत्यक्ष आवंटन, टेंडर की शर्तों का उल्लंघन और बोली की प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए कंसल्टेंट की नियुक्ति में भी नियमों की बड़े स्तर पर अवहेलना की गई है। इसके अलावा निजी खरीददारों और कंपनियों को जमीन बेचने में भी भेदभाव किया गया है।
ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि आईटी पार्क में कंपनियों को जमीन देने में भारी घपला हुआ है। जमीन अलॉटमेंट में एक समान प्रक्रिया को नहीं अपनाया गया है। जमीन की कीमत का निर्धारण भी गलत तरीके से किया गया है और इसमें भी फेरबदल बिना कोई कारण के किए गए हैं।
अलॉटमेंट पालिसी भी निश्चित नहीं है। इस कारण भारी गड़बडिय़ां हुई है। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार जमीन अलॉटमेंट पारदर्शी तरीके से नहीं हुआ है और इसमें मनमानी की बू आ रही है।
इसलिए हुआ स्पेशल ऑडिट
गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने यूटी के बड़े प्रोजेक्टों में धांधली बरते जाने की शिकायतों के बाद ही इनकी स्पेशल ऑडिट के आदेश दिए थे। ऑडिट गृह मंत्रालय के चीफ कंट्रोलर ऑफ अकाउंट्स की देखरेख में हुआ था।

Sunday, October 11, 2009

चंडीगढ़ : बढ़ी पेंशन जल्द मिलेगी बुजुर्गों को

गरीब बुजुर्गों, विधवाओं और विकलांगों को बढ़ी पेंशन जल्द मिलने लगेगी। यदि रिवाइज्ड बजट में मांगा गया धन मिल गया तो समाज कल्याण विभाग अगले महीने से ही 700 रुपए प्रतिमाह देना शुरू कर देगा। विभाग ने एक अप्रैल 2009 से ही बुजुर्ग व विकलांग पेंशन को  250 से बढ़ाकर 500 करने को मंजूरी दी थी। बजट में प्रावधान न होने के कारण इसे तुरंत देना शुरू नहीं किया गया था। उधर, केंद्र सरकार ने भी इन लोगों को 200 रुपए की अतिरिक्त पेंशन देने का फैसला किया था। वह अब मिलना शुरू हुआ है।
दस हजार को फायदा : इस फैसले से दस हजार से ज्यादा लोगों को फायदा होगा। केंद्र सरकार ने 65 साल से ज्यादा के बुजुर्ग, 80 फीसदी से ज्यादा विकलांग व 40 साल से ज्यादा उम्र की विधवाओं को 200 रुपए अतिरिक्त रूप से देने का फैसला किया था। समाज कल्याण विभाग से 6 हजार से ज्यादा बुजुर्ग पेंशन ले रहे हैं। जिन बुजुर्गों की आमदनी एक हजार रुपए मासिक से कम है व बेटी-बेटियों से अलग रह रहे हैं उनके लिए यह पेंशन दी जाती है। यदि उनकी पत्नी जिंदा है तो आमदनी 1500 रुपए होना चाहिए।

Monday, September 21, 2009

वेदान्त का सूक्ष्म शरीर ही है डीएनए

वेदान्त दर्शन में जिसे सूक्ष्म शरीर कहा गया है क्या वह असल में डीएनए की ओर ही संकेत है। कहा गया है कि सूक्ष्म शरीर मन, बुद्धि और अहंकार से मिलकर बना है। डीएनए के भी दो मुख्य गुण हैं, जिनकी वजह से उसे जीवन का आधार कहा जाता है- सेंस और एंटी सेंस। सेंस ही बुद्धि है और एंटीसेंस प्रतिक्रिया यानी अहंकार।
इस संबंध में विस्तार से पढ़ें-http://sudhirraghav.blogspot.com/

Monday, September 14, 2009

ज्ञात या अज्ञात

http://dadajikablog.blogspot.com/2009/09/blog-post_14.html